महिलाएं किसी पर निर्भर न रहें : साध्वी डा. भगवती सरस्वती

कोलकाताः परमार्थ निकेतन की साध्वी डा. भगवती सरस्वती को स्वयंसेवी सेवाओं के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साध्वी भगवती सरस्वती 26 साल पहले स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद जब पीएचडी करने भारत आई थीं। वह विगत 26 सालों से बच्चों, महिलाओं, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित परिवारों, गंगा मां और सभी जल निकायों, पर्यावरण और हर जाति, धर्म, रंग, पंथ और प्रजातियों के सभी प्राणियों के लिए निस्वार्थ सेवा कर रही हैं। साध्वी भगवती सरस्वती, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष और कई धर्मार्थ फाउंडेशनों के संस्थापक स्वामी चिदानंद सरस्वती की शिष्या हैं। इन दशकों में उनकी ओर से मानवता और प्रकृति को समर्पित कई सेवायें संचालित की जा रही है। सन्मार्ग से उन्होंने खास बातचीत की। उनके साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश
भारतीय दर्शन और शाकाहार से प्रभावित
साध्वी भगवती सरस्वती ने सन्मार्ग से कहा कि वे 1996 में अमेरिका से भारत घूमने आई थीं। भारतीय शाकाहार और दर्शन से वे इतनी प्रभावित हुईं कि महज 30 साल की उम्र में उन्होंने घर-परिवार को छोड़कर संन्यास ले लिया और ऋषिकेश में गंगा किनारे मौजूद परमार्थ निकेतन आश्रम को अपना घर बना लिया।
अमरीका और भारत के लोगाें की मानसिकता में है बड़ा अंतर
महिला सशक्तीकरण पर काम कर रहीं साध्वी भगवती सरस्वती बताती हैं कि अमेरिका से वे पहली बार भारत आई थीं, तो अमेरिका और भारत के लोगों की मानसिकता में बड़ा अंतर देखने को मिला। अमेरिका में शिकायतें ज्यादा हैं लेकिन भारत के लोग परमात्मा की कृपा पर भरोसा करते हैं।
महिलाएं किसी पर निर्भर न रहें
साध्वी भगवती सरस्वती कहती हैं महिलाओं को अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। महिलाओं को अपने भीतर आनंद खोजना चाहिए। भगवान का ध्यान करना चाहिए। जिस काम से मन प्रसन्न होता है, वह काम पूरी एकाग्रता से करना चाहिए। महिलाओं को नदियों की तरह जीवन जीना चाहिए। हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए।
नदी की तरह हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए
महिलाओं को नदियों की तरह जीवन जीना चाहिए। हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए। जिस तरह नदी में कुछ भी डाला जाए, वह रुकती नहीं है, बहती रहती है, नदी के रास्ते में कई बड़े-बड़े पत्थर आते हैं, चट्टानें आती हैं। नदीं अपने प्रवाह से पत्थरों को हटा देती है और जिन चट्टानों को नहीं हटा पाती है, वहां से अपना रास्ता बदल लेती है। नदी की तरह महिलाओं को आगे बढ़ना चाहिए, अगर कोई बाधा डाल रहा है तो मजबूती से उसे हटाएं, अगर बाधा न हटे तो अपना रास्ता बदलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

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