इमरान सरकार ने कट्टरपंथी विचारों को बढ़ाया, हिंदू-ईसाइयों पर खतरा-यूएन

न्यूयॉर्क : संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता लगातार बिगड़ती जा रही है। वहां के हिंदू और ईसाई समुदायों की महिलाओं और बच्चियों को अगवा कर धर्म परिवर्तन कराया जाता है। आयोग का कहना है कि इमरान सरकार द्वारा भेदभावपूर्ण कानून ने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिए चरमपंथी मानसिकता वाले लोगों को सशक्त बनाया है।

कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा दिया जा रहा है

यूएन की कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन (सीएसडब्ल्यू) की रिपोर्ट के मुताबिक, इमरान सरकार अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा दे रही है। कमीशन ने 47 पन्नों की रिपोर्ट को ‘पाकिस्तान धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला’ नाम दिया है। सीएडब्ल्यू ने पाकिस्तान में ईशनिंदा और अहमदिया विरोधी कानून के बढ़ते राजनीतिकरण पर चिंता जताई है। इस कानून का उपयोग इस्लामी समूह न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने बल्कि राजनीतिक आधार हासिल करने के लिए भी किया जा रहा है।

अगवा कर मुस्लिम व्यक्ति से शादी करा दी जाती है

आयोग का कहना है कि इस्लामी राष्ट्र में विशेष रूप से ईसाई और हिंदू समुदाय खासतौर से महिलाएं और लड़कियां कमजोर हैं। हर साल हजारों को अगवा करके धर्मांतरण के बाद मुस्लिम व्यक्ति से शादी कराई जाती है। अगवा करने वालों की धमकियों के कारण पीड़िताओं के पास अपने परिवार के पास लौटने की बहुत कम या कोई भी उम्मीद नहीं रहती है। इसके साथ ही आयोग ने उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। मई 2019 में सिंध के मीरपुरखास के रहने वाले एक हिंदू पशुचिकित्सा अधिकारी रमेश कुमार मल्ही पर कुरान का आयतों वाले पन्नों में दवाई लपेटने के लिए ईशनिंदा का आरोप लगा था। प्रदर्शनकारियों ने चिकित्सक के क्लीनिक को और हिंदू समुदाय के अन्य लोगों की दुकानों को आग के हवाले कर दिया था।

ईशनिंदा कानून से धार्मिक उन्माद भड़कता है

ईशनिंदा कानून और उसके ऊपर बढ़ते कट्टरवाद की वजह से देश में सामाजिक सौहार्द को भारी नुकसान पहुंचा है। ईशनिंदा के संवेदनशील मामलों की वजह से धार्मिक उन्माद भड़कता है और इससे पाकिस्तान में भीड़ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। आयोग ने पाकिस्तान में उस ईशनिंदा कानून का विरोध किया जो किसी पर भी इस्लाम का अपमान करने के आरोप में अपराधी बना देता है। इसका दुरुपयोग करके धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए जाते हैं।

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