होली हो तो मणिपुर जैसी!

होता है गोविंदजी का पूजन

जब भी होली की बात चलती है तो वृंदावन, बरसाना, मथुरा, जयपुर आदि शहरों की चर्चा ही सबसे अधिक होती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पूर्वोत्तर भारत में बसे राज्य मणिपुर में होली की मस्ती ब्रज या उत्तर भारत के तमाम राज्यों से किसी भी मायने में कम नहीं है। भले ही तमाम अराजकता, राजनीतिक हिंसा या उग्रवादी गतिविधियों के कारण साल के ज्यादातर महीनों में यह राज्य शेष भारत से कटा रहता हो, लेकिन होली के दिनों में यहां के लोगों का उत्साह, उमंग और त्योहार के प्रति आनंद की भावना देखने लायक होती है।

संपूर्ण उत्तर भारत की होली अकेले मणिपुर की होली के आगे फीकी पड़ जाती है, अगर ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके बावजूद हर साल, सारे टीवी चैनल बरसाने की लट्ठमार होली और वृंदावन के मंदिरों की होली दिखाते हैं, लेकिन इंफाल की होली कोई नहीं दिखाता।

● याओशांग यानी कुटिया में देव : फाल्गुन महीने की पूर्णिमा से यहां का पारंपरिक याओशांग (‘छोटी कुटी में देवता’) उत्सव शुरू होता है, जिसे स्थानीय निवासी धूमधाम से मनाते हैं। त्यौहार शुरू होने के साथ ही रंगों की बौछार शुरू हो जाती है। होलिका दहन की ही तरह यहां बिचाली, लकड़ी और घास-फूस से बनी झोंपड़ी का दहन किया जाता है। इस सुन्दर-सी झोंपड़ी में होलिका रखी जाती है। पूजा होती है। गीत होते हैं। दहन के साथ पांच दिवसीय होली शुरू होती है और अंतिम दिन ‘हलंकार’ के साथ पूर्णाहुति होती है। चांदनी रात में खूब नाच-गाना होता है जिसे यहां थाबल चोंगबा कहते हैं। थाबल यानी चांदनी और चोंगबा का अर्थ है नृत्य। बच्चे नाकाथेंग परम्परा का निर्वाह करते हुए लोगों से चंदा मांगते हैं, ठीक इसी तरह यहां की खूबसूरत और स्मार्ट लडकियां भी लड़कों से चंदा मांगने में पीछे नहीं रहतीं।

● गोविंदजी का पूजन: यहां के इम्फाल शहर में गोविंदजी (श्रीकृष्ण) का मनमोहक मंदिर है, जो यहां के सामाजिक जनजीवन में अध्यात्म और शांति का एक प्रमुख केंद्र है। 18वीं सदी से वैष्णव धर्म का आगमन और प्रभाव बढ़ने के साथ ही याओसांग उत्सव और होली मिलजुलकर एकरूप हो गए। होली पर पांच दिन पूरा मणिपुर त्यौहारमय रहता है। पांच दिन लगातार बाजार बंद, दफ्तर बंद, कामकाज बंद, सड़कों पर न के बराबर भीड़। पांच दिन प्रदेश के कोने-कोने से गलती वस्त्रों में ‘पाला’ यानी टोलियां गोविंदजी के मंदिर में आती हैं। अत्यंत मधुर और सम्मोहित करने वाले स्वर में कृष्ण के होली गीत, भजन गाती हैं, वहां बहुत ही भद्रता से पिचकारी के असली रंग और गुलाल का खेल होता है। कुछ कुछ देर बाद सैकड़ों ‘पाला’ मंदिर आते हैं, होली खेलते हैं, फिर अपने गांव, बस्ती को होली के लिए लौटते हैं। हर बस्ती में, प्रायः हर घर के सामने स्थानीय ‘पाला’ होली खेलते हैं। बच्चे, नौजवान, हर सड़कपर गाड़ियां रोक कर ‘होली’ का चंदा मांगते हैं। सुरक्षाकर्मी, पुलिस, सेना – सबकी गाड़ियां रोकते हैं- कोई मांग नहीं, जितना दे दो पांच, दस, बीस या सौ उतना लेकर मान जाते हैं।

 

 

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