गॉल-ब्लैडर की पथरी के हो सकते हैं विविध रूप, ऐसे पहचाने इसके लक्षण… 

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कोलकाता : पित्त की थैली को अंग्रेजी में गॉल-ब्लैडर कहते हैं। थैली जैसा यह महत्त्वपूर्ण अंग पेट के ऊपरी दाएं भाग में जिगर के ठीक नीचे होता है। पित्त जिगर में बनता है और फिर पित्त की थैली में आता है जहां से वह एक पतली नली द्वारा छोटी आंत में जाता है। पित्त भोजन में ली गई वसा को पचाने का काम करता है। जब-जब आंत को पित्त की जरूरत पड़ती है तब तब पित्त की थैली सिकुड़ जाती है। थैली के सिकुडऩे से उसमें मौजूद पित्त नली के जरिए आंत में चला जाता है। थैली के रिक्त स्थान में फिर जिगर से नया पित्त आ जाता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।

तब थैली में पथरी हो जाती है

पित्त में प्रधानत: पानी होता है। इसके अतिरिक्त बाइल एसिड और कोलेस्ट्रॉल भी एक निश्चित मात्रा में मौजूद रहता है। जब किन्हीं कारणों से पित्त के तत्वों का अनुपात असंतुलित हो जाता है तब थैली में पथरी हो जाती है। अधिकतर यह रोग मोटी औरतों को होता है जिनकी उम्र 40 से अधिक हो जाती है लेकिन अब तो हर आयु वर्ग के लोगों में यह समस्या देखने में आ रही है। कभी-कभी तो बच्चे भी इसकी चपेट में आते देखने को मिल जाते हैं। गॉल-ब्लैडर की पथरी के मामले आजकल बहुतायत में सामने आ रहे हैं।

ब्लैडर में सूजन के बाद पता चलता है

गॉल-ब्लैडर में पथरी होने का पता अमूमन तब चलता है जब पथरी की वजह से ब्लैडर में सूजन आ जाती है। पथरी बन रही है इसका पता नहीं चलता। अहसास तब होता है जब पेट के दाएं तरफ पसलियों के नीचे असह्य दर्द उठता है। मरीज इस मर्ज से छटपटा उठता है। ऐसे में मरीज को लगता है कि अब मरा। जब दर्द उठता है तो सामान्य प्रचलित दर्द निवारक गोलियां खाने का कोई असर नहीं होता। कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि दर्द निवारक खाने से दर्द और बढ़ गया। यह दर्द प्राय: रात को उठता है और कम से कम दो घंटे बुरी तरह रुलाता है। दो घंटे बाद यह कभी भी स्वयं ही शांत हो जाता है। यह दर्द अक्सर उठता है। इस श्रेणी की अवस्था ‘एक्यूट कोलिसिस्टाइटिस’ कहलाती है।

समस्या तब ज्यादा होती है जब…

पित्त की पथरी के बहुत से मरीज दर्द से बचे रहते हैं मगर उन्हें बदहज़मी और खट्टी डकारों की शिकायत रहती है। यह समस्या तब ज्यादा होती है जब तला-भुना, अधिक वसा वाला भोजन खा लें। ऐसे में मरीज को लगता है कि पेट भरा है। खट्टी डकारें आती हैं और सीने में जलन होती हैं। ‘एक्यूट कोलिसिस्टाइटिस’ के मरीजों का ब्लैडर फूट सकता है, उसकी सूजन छितरकर अन्य अंगों को अपनी चपेट में ले सकती है और इसने भयंकर रूप धारण कर लिया तो ब्लैडर फूलकर फट भी सकता है।

जब ब्लैडर सिकुड़ जाता है

एक समय आने पर ब्लैडर सिकुड़ कर जरा सा हो जाता है और शरीर के लिए बेमतलब हो जाता है। ऐसी स्थिति में इससे मरीज को कोई विशेष परेशानी नहीं होती। इसका पता ही नहीं चलता। पता इसका तब चलता है जब किसी अन्य परेशानी के मामले में अल्ट्रासाउंड अथवा रंगीन एक्स-रे या कोई अन्य सूक्ष्म जांच कराई जाए मगर यह निष्प्रयोज्य ब्लैडर आगे चलकर कैंसरग्रस्त हो सकता है। तब यह आदमी के लिए मुसीबत बन जाता है। इसलिए चिकित्सा विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जब यह पता चला कि पित्त में पथरी है (चाहे वह तकलीफदेह न हो), ऑपरेशन कर निकलवा देना ही भविष्य के लिए सुरक्षा है।

बाइल डक्ट

जब गॉल-ब्लैडर में पथरी होती है तो पित्ताशय से छोटी आंत तक पित्त की आपूर्ति करने वाली नली (वाहिका) भी पथरीग्रस्त हो जाती है। इसे बाइल डक्ट कहते हैं। पित्ताशय का आपरेशन हो तो साथ में बाइल डक्ट का भी सफाया जरूरी है अन्यथा बाद में फिर एक आपरेशन बाइल डक्ट के लिए भी कराना पड़ सकता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 40 वर्ष आयु तक के स्वस्थ व्यक्ति को ठीक होने में एक सप्ताह से 15 दिन तक का समय लगता है। इससे अधिक उम्र के व्यक्ति को ज्यादा समय लग सकता है।

मरीज अगर अत्यंत वृद्ध और दुर्बल हो तो ऑपरेशन कराना खतरनाक है। ऐसे मरीज के लिए शॉक-वेव लिथोट्रिप्सी तकनीक से पथरी का चूरा बनाया जाता है। ऑपरेशन के दौरान मरीज को रक्त की आवश्यकता होती है। अत: ऑपरेशन से पूर्व ब्लड ग्रुप की जांच और तदनुसार उस ग्रुप के रक्त की व्यवस्था भी कर लेनी चाहिए। पूरी सावधानी उचित समय पर जांच और विशेषज्ञ सर्जन की सहायता रोगी को समस्या से आसान और सुरक्षित निदान दिला सकती है।

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