अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनसे जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर देश की शासन-व्यवस्था और जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही आवारा कुत्तों का प्रबंधन राज्यों का विषय हो, लेकिन उनकी नसबंदी और टीकाकरण के लिए केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था है। इसके बावजूद 2021 से 2024 के बीच केंद्र सरकार ने इस मद में राज्यों को एक भी रुपया जारी नहीं किया, यह तथ्य सामने आते ही मामला राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई
बुधवार को इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि कुत्ते के काटने के बाद इलाज कराने से बेहतर है कि ऐसी स्थिति ही पैदा न हो। अदालत की यह टिप्पणी आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्या की गंभीरता को रेखांकित करती है। पीठ ने याद दिलाया कि 7 नवंबर को दिए गए आदेश में स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस स्टॉप और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि पकड़े गए कुत्तों को वापस उसी जगह छोड़ने के बजाय उनकी नसबंदी, टीकाकरण कर उन्हें शेल्टर होम में रखा जाए।
अदालत ने जताई चिंता
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि ‘पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023’ के नियम 10 के तहत आवारा कुत्तों सहित अन्य पशुओं की नसबंदी, टीकाकरण, शेल्टर होम और पशु चिकित्सालयों की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के माध्यम से इन कार्यों के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता दी जानी थी। लेकिन 2021 से 2024 तक इस मद में कोई राशि जारी न होना अदालत की चिंता का बड़ा कारण बना।
सुप्रीम कोर्ट ने हादसों पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों की समस्या केवल काटने तक सीमित नहीं रह गई है। कुत्तों के अचानक झपटने से होने वाले सड़क हादसों में अब नागरिकों की जान तक जा रही है। यह तय नहीं किया जा सकता कि कुत्ता कब और किस पर हमला कर दे, इसलिए रोकथाम ही सबसे प्रभावी उपाय है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कुत्तों को मार देना समाधान नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जैसे एक बाघ नरभक्षी हो जाए तो पूरे प्रजाति को खत्म नहीं किया जाता, वैसे ही कुत्तों के मामले में भी सामूहिक हत्या अमानवीय और अवैज्ञानिक है। समाधान केवल वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक नीति से ही निकलेगा, जिसमें नसबंदी और टीकाकरण सबसे अहम हथियार हैं।
फंडिंग का सच
2018–19 : 24.4 लाख रुपये
2019–20 : 7.3 लाख रुपये
2020–21 : 4.03 लाख रुपये
2021–24 : शून्य रुपये
आवारा कुत्तों की संख्या (20वीं पशुधन गणना)
देश : 1 करोड़ 53 हजार 955
महाराष्ट्र : 12 लाख 76 हजार 399
रेबीज की भयावह तस्वीर
2022 : 4,885 मामले, 22 मौतें
2023 : 2,223 मामले, 121 मौतें
2024 : 1,079 मामले, 180 मौतें
आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि समस्या को नजरअंदाज करने की कीमत अब मानव जीवन चुका रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और आदेश यह संदेश दे रहे हैं कि अगर केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों ने मिलकर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो आवारा कुत्तों का संकट आने वाले दिनों में और भयावह रूप ले सकता है।