

भारत में बार-बार होने वाला 'सोने का संकट' केवल पीली धातु के प्रति भारतीयों के प्रेम का परिणाम नहीं है। यह मूलतः नीतिगत विफलता है। दशकों से, नीति निर्माताओं ने भारी शुल्क और प्रतिबंध लगाकर सोने के आयात को कम करने का प्रयास किया है, फिर भी भारतीय परिवार सोने को खरीदना और सहेजना जारी रखे हुए हैं। क्योंकि वित्तीय प्रणाली लागत वाला डिजिटल विकल्प प्रदान करने में विफल रही है। यदि भारत वास्तव में आयात के दबाव और चालू खाता घाटे को कम करना चाहता है, तो इसका समाधान सोना खरीदने या रखने पर सजा देने में नहीं, बल्कि सोना रखने के तरीके को बदलने में निहित है।
पहला सुधार आमूल-चूल लेकिन सरल होना चाहिए : डिजिटल सोने और सोवेरन गोल्ड इंस्ट्रूमेंट्स पर डीमैट होल्डिंग चार्ज को प्रभावी रूप से शून्य कर दिया जाए, ठीक उसी तरह जैसे यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को सुगम बनाया। भारत में लोगों के पास लगभग 25,000 टन निजी सोने का भंडार है, जिसका अधिकांश भाग लॉकरों में निष्क्रिय पड़ा है। यदि परिवार तरलता और विश्वास के साथ भौतिक सोने को कम लागत वाली डिजिटल होल्डिंग में आसानी से परिवर्तित कर सकें, तो निष्क्रिय सोने का एक बड़ा हिस्सा औपचारिक वित्तीय प्रणाली में प्रवेश कर सकता है। सरकार को सोवेरन गोल्ड बांड को पुनर्जीवित व पुनर्गठित करना चाहिए। पहले की योजनाओं में संभावनाएं थीं, लेकिन जटिलता और कम भागीदारी के कारण वे से शून्य किया जा सकता है उद्देश्य स्पष्ट संस्थाओं की बारीकी से जांच करनी चाहिए एक नहीं होना चाहिए : आयातित भौतिक सोने की जो सोने को विशुद्ध रूप से निवेश परिसंपति विफल रहीं।
एक नया कार्यक्रम, जो सांकेतिक रूप से 1% वार्षिक रिटर्न भी प्रदान करे, निवेशकों को भौतिक सोने से दूर आकर्षित कर सकता है। भारत के लोग सोने से उच्च रिटर्न की मांग नहीं करते; वे सुरक्षा, तरलता और सुपरिचय चाहते हैं। टैक्स पॉलिसी में भी रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता है। सीमित अवधि के लिए, डिजिटल सोने के लेनदेन पर कैपिटल गेन टैक्स को समाप्त कर दिया जाना चाहिए या भौतिक सोने की तुलना में काफी कम कर दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार, डिजिटल सोने के उपकरणों पर जीएसटी को अस्थायी रूप तुलना में कागजी और डिजिटल सोने के लिए एक निर्णायक नीतिगत प्राथमिकता स्थापित करना।
एक और अनदेखा मुद्दा आभूषण और मुद्रीकृत सोने के बीच उच्च रूपांतरण लागत है। जब भी एमएमटीसी या रिफाइनर्स जैसी एजेंसियां भौतिक सोने को कागजी उपकरणों में परिवर्तित करती हैं, तो पिघलने में होने वाली हानि और प्रोसेसिंग चार्ज इतने होते हैं कि लोग इससे दूर भागते हैं। नीतिगत प्रोत्साहनों या मानकीकरण के माध्यम से इन घर्षण लागतों को कम करने से काफी सुधार हो सकता है। भारत को रिसाइक्लिंग को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। परिवार अक्सर पुराने आभूषणों को दोबारा बनवाने से बचते हैं क्योंकि इस प्रक्रिया से अतिरिक्त टैकस देनदारियां और मूल्यांकन विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। पुराने आभूषणों के रि-मेकिंग या रिसाइक्लिंग पर कैपिटल गेन हटाने से परिवारों को नए आयातित सोने को खरीदने के बजाय निष्क्रिय पड़े सोने को फिर से प्रचलन में लाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही, नियामकों को उन गैर-व्यक्तिगत संस्थाओं की बारीकीसे जांच करनी चाहिए जो सोने को विशुद्ध रूप से निवेश परिसंपत्ति के रूप में रखती हैं। ईटीएफ और इसी तरहके साधनों के माध्यम से संस्थागत संचय आयात और विदेशी मुद्रा की मांग पर दबाव बनाते हैं।
सट्टा संस्थागत स्वर्ण भंडारों पर अलग-अलग कराधान से घरेलू बचतकर्ताओं को नुकसान पहुंचाए बिना अत्यधिक संचय को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। अंत में, भारत को एक बार की गोल्ड एमनेस्टी और मॉनेटाइजेशन स्कीम पर विचार करना चाहिए। इसके तहत, व्यक्ति पांच साल के लिए भौतिक सोना जमा कर सकते हैं और इस जांच से पूरी तरह मुक्त रहेंगे कि पिछला सोना कहां से आया। लॉक-इन अवधि के दौरान कोई मूल्यवृद्धि या ब्याज नहीं मिलेगा, लेकिन धारकों के पास गिरवी रखने या भंडार को बेचने का अधिकार रहेगा। परिपक्वता पर,
उन्हें मूल मूल्य या प्रचलित मूल्य, जो भी कम हो, प्राप्त होगा। भारत सोने पर निर्भरता से छुटकारा टैक्स लगाकर नहीं पा सकता। उसे नवाचार का तरीका अपनाना होगा। भविष्य डिजिटल सोने को भौतिक सोने से सस्ता, सरल व अधिक साथ ही, नियामकों को उन गैर व्यक्तिगत भरोसेमंद बनाने में निहित है।
उन्हें मूल मूल्य या प्रचलित मूल्य, जो भी कम हो, प्राप्त होगा। भारत सोने पर निर्भरता से छुटकारा टैक्स लगाकर नहीं पा सकता। उसे नवाचार का तरीका अपनाना होगा। भविष्य डिजिटल सोने को भौतिक सोने से सस्ता, सरल व अधिक साथ ही, नियामकों को उन गैर व्यक्तिगत भरोसेमंद बनाने में निहित है।