EXPLAINER : पेट्रोल-डीजल ₹3 महंगा, जानिए आखिर क्यों टूटा सरकार का कंट्रोल

ईरान तनाव, महंगा कच्चा तेल और गिरता रुपया बना वजह, 10 हफ्तों से दबाव झेल रही थीं ऑयल कंपनियां
EXPLAINER : पेट्रोल-डीजल ₹3 महंगा, जानिए आखिर क्यों टूटा सरकार का कंट्रोल
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नई दिल्ली : देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी ने आम लोगों की जेब पर असर डालना शुरू कर दिया है। लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखने के बाद आखिरकार सरकार और ऑयल कंपनियों को यह फैसला लेना पड़ा। इसके पीछे सिर्फ एक कारण नहीं, बल्कि वैश्विक और घरेलू दबावों का पूरा सिलसिला जिम्मेदार है।

सबसे बड़ा कारण बना पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, खासकर Iran से जुड़ा संघर्ष। इस तनाव ने वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित किया। दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक, Strait of Hormuz, में अनिश्चितता और शिपिंग में देरी से बाजार में डर पैदा हुआ। ऐसे हालात में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं। जहां पहले भारत को कच्चा तेल करीब 69 डॉलर प्रति बैरल मिल रहा था, वहीं यह बढ़कर 113-114 डॉलर तक पहुंच गया।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में हर बढ़ोतरी सीधे देश पर असर डालती है। इस बीच, कई देशों के बीच सीमित तेल आपूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई, जिससे कीमतें और ऊपर चली गईं। सिर्फ तेल ही महंगा नहीं हुआ, बल्कि उसे भारत तक लाने का खर्च भी बढ़ गया क्योंकि शिपिंग और बीमा दरें भी ऊंची हो गईं।

इस पूरे संकट को और गहरा किया रुपये की कमजोरी ने। डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 95.95 के स्तर तक गिर गया। चूंकि कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है, ऐसे में कमजोर रुपया भारत के लिए तेल को और महंगा बना देता है। यानी एक साथ दोहरी मार पड़ी—तेल महंगा और डॉलर भी महंगा।

इस दौरान सरकारी तेल कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Ltd और Hindustan Petroleum Corporation Ltd लगातार 10 हफ्तों तक पुराने दामों पर ईंधन बेचती रहीं। जबकि उनकी लागत करीब 50% तक बढ़ चुकी थी। इस वजह से उन्हें रोजाना करीब 1,600 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था और कुल घाटा 1 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया।

सरकार ने भी पहले राहत देने के लिए एक्साइज ड्यूटी में भारी कटौती की थी। पेट्रोल पर टैक्स 13 रुपये से घटाकर 3 रुपये और डीजल पर लगभग शून्य कर दिया गया। इससे हर महीने करीब 14,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ। ऐसे में एक तरफ कंपनियों का घाटा बढ़ रहा था, तो दूसरी तरफ सरकार की कमाई घट रही थी।

वैश्विक तनाव के चलते रिफाइनिंग, ट्रांसपोर्ट और बीमा जैसे खर्च भी बढ़ गए। ऐसे माहौल में तेल कंपनियों के लिए लंबे समय तक नुकसान सहते हुए कीमतें स्थिर रखना संभव नहीं था।

हालांकि ₹3 की यह बढ़ोतरी पूरी लागत को कवर नहीं करती। कंपनियां अब भी नुकसान का बड़ा हिस्सा खुद उठा रही हैं। लेकिन यह कदम दबाव को थोड़ा कम करने और स्थिति को संभालने के लिए जरूरी माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आगे की स्थिति काफी हद तक मध्य पूर्व के हालात और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी। अगर वैश्विक बाजार में राहत नहीं मिलती, तो आने वाले समय में कीमतों में और बदलाव देखने को मिल सकता है।

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