‘घर पर रहने वाली पत्नी को आलसी कहना गलत’, हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘घर पर खाली बैठी पत्नी’ की धारणा को खारिज करते हुए कहा है कि एक गृहिणी का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है, और भरण-पोषण की राशि तय करते समय उसके योगदान को नजरअंदाज करना ‘अन्यायपूर्ण’ है।
दिल्ली हाईकोर्ट की फाइल फोटो
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नई दिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘घर पर खाली बैठी पत्नी’ की धारणा को खारिज करते हुए कहा है कि एक गृहिणी का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है, और भरण-पोषण की राशि तय करते समय उसके योगदान को नजरअंदाज करना ‘अन्यायपूर्ण’ है। काम नहीं करने वाली पत्नी को आलसी नहीं कहा जा सकता है।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि पत्नी के रोजगार में नहीं होने को खाली बैठे होने या जानबूझकर निर्भरता के समकक्ष नहीं माना जा सकता है, और भरण-पोषण का निर्धारण करते समय, कानून को न केवल वित्तीय आय को बल्कि विवाह के अस्तित्व में रहने के दौरान घर और घरेलू संबंधों में उसके योगदान के आर्थिक मूल्य को भी मान्यता देनी चाहिए।

उच्च न्यायालय ने 16 फरवरी को पारित आदेश में कहा, ‘‘रोजगार में न होने को खाली बैठा होना कह देना आसान है; लेकिन एक घर को चलाने और संभालने में लगने वाले श्रम को मान्यता देना कहीं अधिक कठिन है। पीठ ने कहा, ‘‘एक गृहिणी खाली नहीं बैठती, वह ऐसा श्रम करती है जिससे कमाने वाला पति प्रभावी ढंग से कार्य कर सके। भरण-पोषण के दावों का निर्णय करते समय इस योगदान की उपेक्षा करना अवास्तविक और अन्यायपूर्ण होगा।’’

घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई में कोर्ट की यह टिप्पणी

अदालत ने कहा, ‘‘इसलिए, यह अदालत ऐसे किसी भी दृष्टिकोण से सहमत नहीं हो सकती, जो पत्नी के रोजगार में नहीं होने को खाली बैठे होने या पति पर जानबूझकर निर्भरता के बराबर मानता हो।’’ उच्च न्यायालय ने ये टिप्पणियां घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण देने के मामले पर विचार करते हुए कीं।

मजिस्ट्रेट अदालत ने महिला को अंतरिम गुजारा भत्ता देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि वह शारीरिक रूप से स्वस्थ और शिक्षित है, लेकिन उसने नौकरी न करने का विकल्प चुना है। अपीलीय अदालत ने भी पत्नी को कोई राहत नहीं दी। मामले के पक्षकारों का विवाह 2012 में हुआ था और आरोप है कि पति ने 2020 में पत्नी और उनके नाबालिग बेटे को छोड़ दिया था।

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पति की दलील पर अदालत की तीखी टिप्पणी

पति ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि पत्नी निष्क्रिय नहीं बैठ सकती और भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती, जबकि वह कमाने में सक्षम है और वह अपने नाबालिग बच्चे की शिक्षा का खर्च वहन कर रहा है। अदालत ने कहा कि कमाने की क्षमता और वास्तविक कमाई अलग-अलग अवधारणाएं हैं, और स्थापित कानून के अनुसार, केवल कमाने की क्षमता भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं है।

अदालत ने कहा, ‘‘जो महिलाएं काम कर सकती हैं और काम करने को इच्छुक हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन केवल इस आधार पर भरण-पोषण से इनकार करना कि वह कमाने में सक्षम है और उसे अपने पति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, एक त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण है।’’

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