ब्लड मून चंद्र ग्रहण कल, भारत में कब दिखेगा?

तीन मार्च को चंद्रमा सीधे पृथ्वी की छाया से गुजरेगा, जिससे पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा।
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मंगलवारः तीन मार्च को चंद्रमा सीधे पृथ्वी की छाया से गुजरेगा, जिससे पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया और ऑटेरोआ (न्यूजीलैंड) इस नजारे को देखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पर हैं। इस बार तो ग्रहण एक सुविधाजनक समय पर लगेगा। ऐसे में अलार्म लगाने और बेतुके समय पर बिस्तर से उठने की कोई जरूरत नहीं है।

मंगलवार शाम को, चमकीले और पूर्ण चंद्रमा पर एक गहरी छाया पड़नी शुरू हो जाएगी। एक बार जब चंद्रमा पूरी तरह से छाया में डूब जाएगा, तो वह लाल रंग की चमक लेने लगेगा। खगोलविद इसे ‘‘पूर्णता’’ कहते हैं। लेकिन आकाश में विशाल लाल चंद्रमा के भयावह रूप को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इतिहास और विभिन्न संस्कृतियों में इसे अशुभ संकेत माना जाता रहा है। आज की दुनियाय में, ‘‘रक्त चंद्रमा (ब्लड मून)’’ नाम ने जनपरिकल्पना में तुरंत जगह बना ली है।

चंद्र ग्रहण देखना हमें याद दिलाता है कि हम एक आकर्षक ब्रह्मांड का हिस्सा हैं। इसके लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती और आमतौर पर आकाश में चंद्रमा को ढूंढना मुश्किल नहीं होता। कल का ग्रहण 2029 तक रक्त चंद्रमा को देखने का हमारा आखिरी मौका होगा, जब उस साल एक जनवरी की सुबह नए साल के आगमन के साथ पूर्ण चंद्रग्रहण दिखेगा।

चंद्र ग्रहण कब देख सकते हैं?

चंद्र ग्रहण एक धीमी गति से होने वाली घटना है जिसे घटित होने में कुछ घंटे लगते हैं। इस बार चंद्रमा को पृथ्वी की छाया में प्रवेश करने में 75 मिनट लगेंगे - जिसे आंशिक ग्रहण कहा जाता है। इसके बाद एक घंटे का पूर्ण ग्रहण होगा, जब चंद्रमा लाल हो जाएगा। और फिर अगले 75 मिनट में चंद्रमा छाया से बाहर निकलकर अपनी पूरी चमक पर लौट आएगा।

चूंकि पृथ्वी की छाया चंद्रमा की तुलना में बहुत बड़ी होती है, इसलिए पृथ्वी के रात्रि भाग में रहने वाले सभी लोग चंद्र ग्रहण को ठीक एक ही समय पर अनुभव करते हैं। पूर्ण ग्रहण देखने का समय जानने के लिए, हमें केवल विभिन्न समय क्षेत्रों के अनुसार समय में समायोजन करना होता है।

भारत में कब और कहां दिखेगा चंद्रग्रहण

भारतीय समयानुसार ग्रहण दोपहर 3:20 बजे से चंद्रग्रहण शुरू होगा और शाम 6:46 बजे तक चलेगा। कुल अवधि लगभग 3 घंटे 27 मिनट रहेगी। पूरे भारत से ग्रहण पूरी तरह नहीं दिखेगा क्योंकि चंद्रमा तभी उगेगा जब ग्रहण पहले ही शुरू हो चुका होगा, लेकिन ग्रहण का आखिरी हिस्सा आप अधिकांश हिस्सों में देख पाएंगे जब चांद शाम को निकलते समय अभी भी पृथ्वी की छाया में होगा। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत (जैसे सम, पूर्व बंगाल) में चांद जल्दी उगेगा, इसलिए वहां ग्रहण का दृश्य थोड़ा बेहतर दिखाई दे सकता है। उदाहरण के लिए कोलकाता में चांद लगभग 5:39 बजे उगेगा और ग्रहण का अंतिम चरण आप लगभग 6:48 बजे तक देख पाएंगे।

ऑस्ट्रेलिया में दिखेगा खूबसूरत नजारा

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश हिस्सों में ग्रहण की शुरुआत चंद्रमा के क्षितिज के नीचे होने से होगी। जैसे-जैसे चंद्रमा ऊपर उठेगा, वह आंशिक रूप से छाया में आता जायेगा, जिससे उसे देखना मुश्किल हो जायेगा, खासकर तेज रोशनी वाले गोधूलि आकाश में (ध्यान दें कि चंद्रमा सूर्य के अस्त होने के समय उग रहा है)। हालांकि, बस थोड़ा समय देना होगा। और फिर ग्रहण लगा हुआ चंद्रमा पूर्व में ऊपर चढ़ने के साथ-साथ और गोधूलि बेला रात में बदलने के साथ-साथ आसानी से दिखाई देने लगेगा।

ऑस्ट्रेलिया के बाकी हिस्सों में ग्रहण शाम को देर से शुरू होगा, जब चंद्रमा पूर्वी आकाश में होगा। न्यूजीलैंड में ग्रहण काफी देर से, स्थानीय समयानुसार रात 10 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगा। इससे ग्रहण का सबसे अच्छा नजारा देखने को मिलेगा, क्योंकि आकाश में पूरी तरह से अंधेरा होगा और चंद्रमा उत्तर दिशा में काफी ऊपर होगा।

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चंद्रमा लाल क्यों हो जाता है?

तेज रोशनी वाले चंद्रमा के सामने पृथ्वी की छाया पहले काली दिखाई देती है। चंद्रमा के पूरी तरह से इस छाया में डूबने पर ही लालिमा लिए हुए ‘रक्त चंद्रमा’ चमकता हुआ नजर आने लगता है। चंद्रमा कितना लाल दिखाई देता है, यह पूरी तरह से उस समय पृथ्वी के वायुमंडल की स्थिति पर निर्भर करता है। वायुमंडल जितना अधिक धूल भरा होगा, उतना ही कम प्रकाश उसमें से गुजर पाएगा, जिससे चंद्रमा गहरा लाल दिखाई देगा। एक साफ और अधिक पारदर्शी वायुमंडल अधिक सूर्य की रोशनी को गुजरने देता है, जिससे चंद्रमा एक चमकदार नारंगी रोशनी में नहा जाता है।

वायुमंडल से केवल लाल प्रकाश ही गुजर पाता है क्योंकि नीला प्रकाश (जिसकी तरंगदैर्ध्य कम होती है) बिखर जाता है। इसे ‘रेले प्रकीर्णन’ कहा जाता है। यही वह प्रक्रिया है जिसके कारण आकाश नीला दिखाई देता है। नीला प्रकाश वायुमंडल से होकर चंद्रमा की ओर नहीं जाता, क्योंकि यह पूरे आकाश में बिखर जाता है। दिन के समय आकाश में हम कहीं भी देखें, हमारी नजर नीले प्रकाश की उन बिखरी हुई किरणों में से किसी एक पर ज़रूर पड़ेगी।

आकाशीय विसंरेखन

चूंकि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष चंद्रमा की कक्षा बहुत थोड़ी झुकी हुई है, इसलिए तीनों पिंड हमेशा पूरी तरह से एक सीध में नहीं आते जिससे हम पूर्ण चंद्र ग्रहण देख सकें। अगले छह चंद्र ग्रहणों के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी की छाया में पूरी तरह से डूबने के बजाय केवल कुछ देर के लिए ही प्रवेश करेगा। दरअसल, 2027 के तीन चंद्र ग्रहणों के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी की बाहरी और बहुत धुंधली उपछाया में ही प्रवेश करेगा। तकनीकी रूप से चंद्रमा थोड़ा धुंधला हो जाएगा, लेकिन इसे महसूस करना लगभग असंभव होगा ( फोटो साभार-स्पेस, चैटजीपीटी)।

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