मकर संक्रांति : पतंगें और फसलें ही नहीं, वजहें और भी हैं...

यूं तो साल भर में कई संक्रांतियां होती हैं, लेकिन दो संक्रातियों का विशेष महत्व है, पहली मकर संक्रांति और दूसरी इससे बिल्कुल उलट जून महीने में होने वाली मेष संक्रांति।
मकर संक्रांति : पतंगें और फसलें ही नहीं, वजहें और भी हैं...
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संक्रांति का अर्थ है - गति या चाल। जीवन गतिशील है। यह पृथ्वी भीगतिशील है, इसी गतिशीलता का नतीजा है कि इससे जीवन उपजा है। लेकिन अगर सृष्टि में गति है तो उस गति का विराम भी होना चाहिए। दरअसल, निश्चलता या स्थिरता की कोख से ही गति का जन्म होता है। गतिशीलता एक निश्चित बिंदु या सीमा तक ही अच्छी लगती है। यह ग्रह पृथ्वी बेहद सौम्य और खूबसूरत तरीके से घूम रही है – इसी वजह से मौसम बदलते हैं। कल को अगर यह अपनी गति बढ़ा दे और थोड़ा तेजी से घूमने लगे तो हमारा संतुलित दिमाग पूरी तरह से असंतुलित हो उठेगा और हर चीज नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। यह कहना है आध्यात्मिक गुरु जग्गी बासुदेव का जिन्हें सदगुरु के रूप में जाना जाता है। सदगुरु ने मकर संक्रांति से जुड़ी कई रोचक बातों को तथ्यों के साथ समझाने की कोशिश की है।

मकर संक्रांति का अर्थ

यूं तो साल भर में कई संक्रांतियां होती हैं, लेकिन दो संक्रातियों का विशेष महत्व है, पहली मकर संक्रांति और दूसरी इससे बिल्कुल उलट जून महीने में होने वाली मेष संक्रांति। हर बार जब राशि चक्र बदलता है तो इसे संक्रांति कहा जाता है, इस शब्द का मतलब हमें पृथ्वी की गतिशीलता के बारे में याद दिलाना है। अगर यह गतिशीलता रुक जाए तो हमारे जीवन से जुड़ा सब कुछ रुक जाएगा। मकर संक्रांति के बाद से सर्दी धीरे-धीरे कम होने लगती है।

एक समय ऐसा था, जब इंसान केवल वही खा सकता था, जो धरती उसे देती थी। इसके बाद हमने कृषि करना सीखा। यह कुछ ऐसा ही है कि जब आप अबोध शिशु होते हैं तो आपकी मां आपको जो देती है, बस आप वही खाते हैं। जब आप बच्चे होते हैं, तो आप अपनी मनचाही चीजों की मांग करने लगते हैं। फिर जब हम कुछ बड़े हो गए और वह मांगने और पाने लगे जो हम चाहते थे, लेकिन अभी भी आपको अपना मनचाहा सिर्फ उतना ही मिलता है, जितना या जिस हद तक मां वह आपको देना चाहती है या देने की इच्छुक है। अगर आप अपनी मांग को इस हद से से ज्यादा खींचने की कोशिश करेंगे तो आपको वो सारी चीजें तो मिलेगी नहीं, हां कुछ और जरूर मिल सकता है। यही औद्योगिकीकरण कहलाता है।

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कृषि वह है, जिसमें आप अपनी मां से अपनी मनचाही देने की खुशामद करते हैं, जबकि औद्योगिकीकरण में आप अपनी मांगों से उसे विदीर्ण या छिन्न-भिन्न कर देते हैं। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि आज हम जो कुछ भी हैं, वो सब इसी धरती से ही लिया हुआ है। मैं देखता हूं कि आज दुनिया में हर तरफ लोग देने की बात कर रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि वे कहां से ये सब दे रहे हैं। अगर आप कुछ कर सकते हैं तो वह है सिर्फ लेना- अब लेने को आप बेहद सौम्य या सभ्य तरीके से भी ले सकते हैं या फिर आप छीन सकते हैं। क्या आप इस दुनिया में अपनी संपत्ति के साथ कहीं और से आए हैं? आपके पास देने के लिए है क्या? आप सिर्फ ले सकते हैं। हर चीज आपको मिली हुई है। उसे समझदारी से ग्रहण करें, बस इतना ही काफी है।

मकर संक्रांति को फसलों से जुड़े पर्व के रूप में भी जाना जाता है। यही वह समय है, जब फसल तैयार हो चुकी है और हम उसी की खुशी मना रहे हैं। इस दिन हम हर उस चीज का आभार दर्शाते हैं, जिसने खेती करने व फसल उगाने में मदद की है। कृषि से जुड़े पशुओं का खेती में एक बड़ा योगदान होता है, इसलिए मकर संक्रांति का अगला दिन उनके लिए होता है। सोमवार को मट्टू पोंगल था। पहला दिन धरती का होता है, दूसरा दिन हमारा होता है और तीसरा दिन जानवरों व मवेशियों का।

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मकर संक्रांति का महत्व

ये त्यौहार हमें याद दिलाते हैं कि हमें अपने वर्तमान और भविष्य को पूरी चेतनता और जागरूकता के साथ गढ़ने की जरूरत है। फिलहाल, हमने पिछले साल की फसल काटी है। अगली फसल को कैसे तैयार किया जाए, इसकी योजना खूब सोच-समझ कर बनाई जाती है, जिसमें जानवरों को भी विचार-विमर्श की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। आपको शहरों से दूर बसे गांवों में इस प्रक्रिया को देखना चाहिए। मुझे इसमें भाग लेने का सौभाग्य मिला है। ये बैठकें इस तरह की जाती हैं कि पशु भी वहां मौजूद हों। यह देखा जाता है कि गांव के पशु कैसे हैं, किस उम्र के हैं, कितने मजबूत हैं, कोई काम कर सकते हैं या नहीं।

ब्रह्मांडीय संबंध 

यह समय योगियों के लिए सबसे अहम है, जब वे अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया में एक नई, ताजगी भरी कोशिश कर सकते हैं। इसी के अनुसार, पारिवारिक लोग भी अपने जीवन में जो कुछ भी कर रहे हों, उसमें एक नई कोशिश कर सकते हैं। योग प्रणाली के कई पहलू खगोलीय प्रणाली और मानव शरीर के बीच के संबंध के आधार पर विकसित किए गए ताकि पल-पल, हर मिनट, हर घंटे, हर दिन लगातार खगोलीय स्थितियों में आने वाले बदलाव का लाभ उठाया जा सके।

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उदाहरण के लिए, संख्या 108 मानव शरीर और संपूर्ण सौर मंडल की रचना में कई रूपों में अहम है। पारंपरिक रूप से अगर आप कोई माला पहनते हैं, तो उसमें 108 मनके होते हैं। अगर आप किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं या किसी ऊर्जा स्थल की प्रदक्षिणा करते हैं, तो वह 108 बार करना होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर किसी को मानव तंत्र पर पूरी महारत, पूरी दक्षता हासिल करनी है, तो उसे 108 चीजें करनी पड़ती हैं। मानव शरीर में 114 चक्र या बिंदु हैं, जहां नाड़ियां या ऊर्जा के प्रवाह मिलते हैं। इन 114 में से 2 शारीरिक ढांचे से बाहर हैं। शरीर के अंदर स्थित 112 चक्रों में से, असली मेहनत 108 पर करनी पड़ती है। अगर आप इन 108 को सक्रिय करने में कामयाब हो गए, तो बाकी के चार अपने आप सक्रिय हो जाएंगे।

ग्रह प्रणाली में भी देखिए - सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास से 108 गुना है। सूर्य और पृथ्वी की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुना है। चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी चंद्रमा के व्यास से 108 गुना है। जिस पथ या कक्षा पर पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उसमें पृथ्वी के 108 पद या अवस्थाएं आती हैं। पृथ्वी किसी माला के मनकों की तरह सूर्य के चारों ओर 108 स्थितियों में खुद को व्यवस्थित करती है। मकर संक्रांति पर सूर्य के चारों ओर 27 नक्षत्र या 108 पद पूरे होते हैं और एक नया चक्र शुरू होता है।

मकर संक्रांति - गतिशीलता का त्यौहार

इसलिए यह फसलों का त्यौहार है, यह गतिशीलता के महत्व को रेखांकित करने का त्यौहार है। उसी के साथ ‘शंकर’ शब्द आपको याद दिलाता है कि इस सबके पीछे जो है, वह है- शिव, जो पूर्ण निश्चल या अचल है, निश्चलता ही गति का आधार और मूल है। अगर सूर्य भी घूमने लगे तो हम मुसीबत में आ जाएंगे। वह गतिशील न होकर एक जगह अचल रहता है, इसलिए हर चीज की गतिशीलता अपने रास्ते पर रहती है। जब कोई इंसान अपने भीतर की स्थिरता से संबंध बनाने की कोशिश करता है, तभी वह गतिशीलता का आनंद जान सकता है, अन्यथा मनुष्य जीवन की गतिशीलता से घबरा जाता है।

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भगवान विष्णु और सुदर्शन चक्र

आज का तथाकथित आधुनिक जीवन ही ऐसा है, जिसके हर बदलाव में आपको पीड़ित होना तय है। जहां बचपन एक तनाव है, किशोरावस्था या युवावस्था उससे बड़ा दुख है, प्रौढ़ावस्था असहनीय है, जबकि बुढ़ापा डरा और सकुचा हुआ और मृत्यु या अंत किसी घोर आतंक या खौफ से कम नहीं। जीवन के हर स्तर या चरण पर कुछ न कुछ समस्या है और वह इसलिए, क्योंकि इंसान को बदलाव से दिक्कत है। दरअसल, वह समझना ही नहीं चाहता कि जीवन की असली प्रकृति ही बदलाव है। अगर आपको स्थिरता का अहसास है, तो गतिशीलता आपके लिए सुखद अनुभूति होगी। अगर आपको पता ही नहीं कि स्थिरता क्या है या आपका उससे कोई संबंध ही नहीं है तो फिर गतिशीलता आपको हैरान कर सकती है।

लोग इस गति के पीछे की चीजों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। कभी तारों को देखकर तो कभी अपने हाथों की लकीरों में और सभी प्रकार की आकृतियों के संकेतों को देखकर। गतिशीलता के साथ यह संघर्ष, गतिशीलता के बारे में पीड़ा व उन्माद वगैरह इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि लोगों को स्थिरता का थोड़ा-सा भी अनुभव नहीं है। अगर आपको स्थिरता का अहसास होगा तो गति आपको परेशान नहीं करेगी। यह वो चीज है, जो आपमें एक निश्चित लय पैदा करती है। हर लय की अपनी एक शुरुआत और एक अंत होता है, गतिशीलता का अर्थ है कैद और निश्चलता का मतलब है चेतना। मकर संक्रांति का पर्व यह याद दिलाता है कि गतिशीलता का उत्सव मनाना तभी संभव है, जब आपको अपने भीतर निश्चतला का अहसास हो।

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