

भारतीय पर्व-परंपरा महज कैलेंडर की तारीखें नहीं बल्कि जीवन को दिशा देने वाली एक जीवंत चेतना है। इन्हीं में से एक देदीप्यमान पर्व है - मकर संक्रांति। प्रतिवर्ष जनवरी में जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो वह केवल नक्षत्र नहीं बदलते, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा और मनुष्य के अंतर्मन की दिशा बदल देते हैं। यह पर्व विज्ञान, कृषि, आध्यात्म और उत्सवधर्मिता का एक ऐसा अद्भुत व्याकरण है, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का आह्वान करता है।
खगोल और दर्शन : उत्तरायण की यात्रा
मकर संक्रांति का आधार पूर्णतः वैज्ञानिक और खगोलीय है। यह वह संधि काल है जब सूर्य दक्षिणायन की यात्रा पूर्ण कर 'उत्तरायण' की ओर अग्रसर होते हैं। भारतीय दर्शन में उत्तरायण केवल दिशा का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है। भीष्म पितामह का इस काल की प्रतीक्षा करना प्रमाणित करता है कि यह समय आत्मिक उन्नति और मोक्ष के द्वार खोलने वाला है। यह संदेश देता है कि जिस प्रकार सूर्य अपनी यात्रा उत्तर की ओर मोड़ते हैं, हमें भी अपने जीवन की दिशा जड़ता से चैतन्यता की ओर मोड़नी चाहिए।
ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य का विज्ञान
प्रकृति के आँगन में यह पर्व बदलाव की मीठी दस्तक है। कड़ाके की ठंड जब विदा लेने लगती है और वसंत अपनी सुगबुगाहट शुरू करता है, तब खेतों में लहलहाती फसलें किसान के परिश्रम की विजय गाथा सुनाती हैं। इस अवसर पर तिल और गुड़ का सेवन केवल परंपरा नहीं, बल्कि आयुर्वेद का विज्ञान है। शीत ऋतु में शरीर को आवश्यक ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करने के लिए तिल, गुड़, घी और खिचड़ी का चयन हमारी पूर्वजों की सूक्ष्म समझ को दर्शाता है। यह आहार हमें प्रकृति की लय के साथ तालमेल बिठाना सिखाता है।
सांस्कृतिक विविधता में एकता का सूत्र
मकर संक्रांति भारत की 'विविधता में एकता' का सबसे सुंदर कोलाज है। उत्तर से दक्षिण तक, इसके स्वरूप बदलते हैं पर सार वही रहता है:
-उत्तर भारत में यह 'खिचड़ी' है, जहाँ पवित्र नदियों में स्नान कर दान की परंपरा है।
-पंजाब में 'लोहड़ी' की अग्नि बुराइयों को स्वाहा करने का प्रतीक है।
-असम में 'भोगाली बिहू' सामूहिक भोज और आनंद का उत्सव है।
-दक्षिण भारत में 'पोंगल' के रूप में यह प्रकृति और पशुधन (नंदी) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।
-गुजरात के आसमान में लहराती रंग-बिरंगी पतंगें मानवीय संकल्पों की ऊँची उड़ान का प्रतिबिंब हैं।
सामाजिक समरसता और 'मीठी' वाणी
इस पर्व का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश तिल-गुड़ के उस छोटे से लड्डू में छिपा है। महाराष्ट्र की वह कहावत -"तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला" (तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो) आज के दौर में परम आवश्यक है। जैसे तिल और गुड़ मिलकर एक रस हो जाते हैं, वैसे ही यह पर्व हमें मतभेदों को भुलाकर समाज में समरसता घोलने की प्रेरणा देता है। यह कटुता को त्याग कर मधुरता अपनाने और पुराने गिले-शिकवों की राख पर नए संबंधों के बीज बोने का समय है।
आध्यात्मिक जागरण और दान की महिमा
आध्यात्मिक धरातल पर मकर संक्रांति 'त्याग' और 'सेवा' का पर्व है। अपनी अर्जित संपदा (अन्न, वस्त्र या धन) का एक अंश समाज के वंचित वर्ग को समर्पित करना हमारे अहंकार को कम करता है। गंगा सागर से लेकर प्रयागराज तक उमड़ता जनसैलाब गवाह है कि मनुष्य आज भी अपनी जड़ों और पवित्रता की तलाश में है। यह पर्व याद दिलाता है कि वास्तविक उन्नति वही है, जिसमें आत्मिक संतोष और परोपकार का भाव सम्मिलित हो।
एक नई दृष्टि का संकल्प
आज जब वैश्विक समाज तनाव और अलगाव के दौर से गुजर रहा है, मकर संक्रांति का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें सिखाता है कि संतुलन ही जीवन है। सूर्य की तरह अनुशासित रहें, तिल की तरह विनम्र, और गुड़ की तरह मधुर।
मकर संक्रांति केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। आइए, इस संक्रांति पर हम केवल अपनी पतंगें ही नहीं, बल्कि अपनी सोच और दृष्टिकोण को भी ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प लें। जब हम स्वयं को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएंगे, तभी यह पर्व सार्थक होगा। -उमेश कुमार साहू