उत्तर कोरिया का अमेरिका को खुला संदेश: परमाणु कार्यक्रम नहीं होगा बंद

किम यो जोंग ने अमेरिका की परमाणु निरस्त्रीकरण मांग को खारिज कर उत्तर कोरिया को ‘स्थापित परमाणु शक्ति’ बताया, सैन्य दबाव को हथियार कार्यक्रम तेज करने की वजह कहा
उत्तर कोरिया ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया पर सैन्य दबाव बनाने का आरोप लगाया है
किम यो जोंग ने साफ कहा है कि उनका देश किसी भी कीमत पर अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम बंद नहीं करेगा
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उत्तर कोरिया ने एक बार फिर अमेरिका के सामने अपने रुख को स्पष्ट कर दिया है। देश के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की बहन और वरिष्ठ नेता किम यो जोंग ने साफ कहा है कि उनका देश किसी भी कीमत पर अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम बंद नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिका की परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग को “पुरानी और अव्यावहारिक सोच” करार दिया।

परमाणु शक्ति के तौर पर मान्यता का दावा

किम यो जोंग ने कहा कि उत्तर कोरिया अब एक स्थापित परमाणु शक्ति है और इसे बदलने की कोई भी कोशिश न तो व्यावहारिक है और न ही कानूनी रूप से संभव। उन्होंने अमेरिका के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि वैश्विक स्तर पर उत्तर कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर सहमति बन रही है।

उत्तर कोरिया ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया पर सैन्य दबाव बनाने का आरोप लगाया है। किम यो जोंग के अनुसार, लगातार बढ़ते सैन्य अभ्यास और हथियारों की तैनाती के कारण ही उनका देश अपनी परमाणु क्षमता को और मजबूत करने के लिए मजबूर है।

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क्यों बढ़ा रहा है परमाणु जखीरा?

विशेषज्ञों के अनुसार, साल 2019 में अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच वार्ता विफल होने के बाद प्योंगयांग ने अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को तेज कर दिया। हाल ही में किम जोंग उन ने एक परमाणु सामग्री उत्पादन संयंत्र का दौरा कर हथियार क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

चीन और रूस की भूमिका अहम

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उत्तर कोरिया के दौरे की तैयारी में हैं। माना जा रहा है कि चीन आर्थिक सहयोग बढ़ाने के जरिए अपने प्रभाव को मजबूत करना चाहता है। वहीं, रूस के साथ भी उत्तर कोरिया के संबंध तेजी से गहरे हो रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलता दिख रहा है।

रणनीतिक संदेश और वैश्विक असर

विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरिया अब खुद को स्थायी परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मान्यता हासिल करना और प्रतिबंधों में ढील पाना है।

उत्तर कोरिया के इस रुख के बाद कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर कूटनीतिक टकराव और तेज होने की आशंका है।

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