

काठमांडू: भारत द्वारा नेपाली चाय के आयात पर लागू किए गए नए गुणवत्ता परीक्षण नियमों को लेकर नेपाल में असंतोष बढ़ता जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि पूर्वी नेपाल के प्रमुख चाय उत्पादक जिलों इलाम और झापा की सभी 83 चाय फैक्ट्रियों ने विरोध स्वरूप अपना उत्पादन बंद कर दिया है। उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि भारतीय प्रतिबंधों जैसी शर्तों ने नेपाल के चाय निर्यात को लगभग ठप कर दिया है।
नेपाल चाय उत्पादक संघ का आरोप है कि भारत समय-समय पर ऐसे व्यापारिक अवरोध खड़े करता रहा है, जिससे नेपाली चाय के निर्यात पर असर पड़ता है। उद्योग जगत का मानना है कि ये कदम पश्चिम बंगाल के चाय उत्पादकों के दबाव में उठाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल भारत का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक राज्य है और दार्जिलिंग चाय उद्योग का केंद्र भी है।
संघ के अध्यक्ष आदित्य पराजुली ने कहा कि उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि काठमांडू पहुंचकर संबंधित मंत्रालयों के अधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले भी सरकार को ज्ञापन सौंपे गए थे, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।
नेपाली निर्यातकों के अनुसार, अप्रैल के मध्य में टी बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा लागू किए गए नए प्रावधानों के कारण चाय का निर्यात 21 दिनों तक प्रभावित रहा। 1 मई से सभी खेपों की अनिवार्य लैब टेस्टिंग लागू की गई, जिसके चलते 20 मई तक निर्यात बाधित रहा।
बाद में भारत ने कुछ राहत देते हुए हर ट्रक की जांच के बजाय रैंडम सैंपलिंग की अनुमति दी, लेकिन निर्यातकों का कहना है कि इससे स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ।
व्यापारियों के मुताबिक, अब भारतीय अधिकारियों द्वारा कोलकाता स्थित आयातकों के गोदामों में नेपाली चाय के नमूने लेकर उनकी जांच की जा रही है। हालांकि सैंपलिंग शुरू हुए कई सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन अब तक अधिकांश लैब रिपोर्ट जारी नहीं हुई हैं। इसके कारण भारतीय बाजार में नेपाली चाय की आपूर्ति प्रभावित हो रही है और बड़ी मात्रा में माल गोदामों में फंसा हुआ है।
नेपाल हर वर्ष करीब 27 हजार टन चाय का उत्पादन करता है। इसमें लगभग 8 हजार टन ऑर्थोडॉक्स चाय और 19 हजार टन सीटीसी चाय शामिल है।
वर्तमान में करीब 1,000 टन चाय नेपाल के गोदामों में जमा है, जबकि लगभग 300 टन चाय भारत में अटकी हुई है। उद्योग जगत को आशंका है कि लंबे समय तक भंडारण के कारण चाय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, जिससे करोड़ों रुपये का नुकसान होने की संभावना है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए नेपाल सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक अंतर-एजेंसी टास्क फोर्स का गठन किया है। इसमें उद्योग मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रिपरिषद कार्यालय तथा खाद्य प्रौद्योगिकी एवं गुणवत्ता नियंत्रण विभाग के अधिकारी शामिल हैं।
टास्क फोर्स की बैठक में भारत के साथ उठे इस व्यापारिक विवाद और इसके समाधान पर चर्चा की जाएगी।
नेपाल की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की संस्था फेडरेशन ऑफ नेपाली चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FNCCI) ने भी सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन का कहना है कि चाय उद्योग नेपाल की अर्थव्यवस्था, रोजगार और निर्यात आय का महत्वपूर्ण आधार है।
FNCCI के अनुसार, चाय उद्योग का सालाना कारोबार 12 से 14 अरब नेपाली रुपये के बीच है। भारत को हर वर्ष 5 अरब रुपये से अधिक की चाय निर्यात की जाती है, जो नेपाल के व्यापार घाटे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चाय उद्योग में सीधे तौर पर लगभग 60 हजार लोग कार्यरत हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र सरकार को सालाना करीब 1 अरब रुपये का राजस्व भी देता है। उद्योग संगठनों का कहना है कि लंबी टेस्टिंग प्रक्रिया, 20 से 25 दिनों तक लैब रिपोर्ट का इंतजार, अतिरिक्त वेयरहाउस शुल्क और खेप अस्वीकृत होने का जोखिम इस पूरे सेक्टर को आर्थिक संकट की ओर धकेल रहा है।
भारत ने 1 मई से सभी आयातित चाय खेपों के लिए लैब परीक्षण अनिवार्य किया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करना और मिलावटी उत्पादों पर रोक लगाना है। हालांकि नेपाल के निर्यातकों का दावा है कि इन प्रक्रियाओं ने व्यवहारिक रूप से चाय व्यापार को बाधित कर दिया है।
भारत नेपाल की चाय का सबसे बड़ा बाजार है। ऐसे में यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल व्यापार पर ही नहीं, बल्कि नेपाल के हजारों किसानों, मजदूरों और चाय उद्योग से जुड़े व्यवसायों पर भी पड़ सकता है। अब सबकी नजर दोनों देशों के बीच होने वाली संभावित कूटनीतिक बातचीत और टास्क फोर्स की सिफारिशों पर टिकी है।