

पिछले एक दशक में कोलकाता की यातायात व्यवस्था सुचारु रहने के बजाय अराजकता की पटरी पर दौड़ती दिखती है। हावड़ा या सियालदह स्टेशन से बाहर निकलते ही यात्रियों को पीली टैक्सी और ऑटो चालकों की भारी मनमानी व मनमाने किराये का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ओला, उबर और 'यात्री-साथी' जैसी ऑनलाइन कैब सेवाएं वरदान साबित हो रही हैं।
कभी शहर की पहचान रहीं पीली टैक्सियां आज बिना फेयर-मीटर के चल रही हैं। हालांकि, ईंधन के बढ़ते दामों के बावजूद आधिकारिक किराया न बढ़ने के कारण चालकों की अपनी मजबूरियां और असमंजस भी है, जिसका समाधान बेहद जरूरी है। 'नो-रिफ्यूजल' जैसी कड़क व्यवस्थाएं भी अब बेअसर हो चुकी हैं।
दूसरी ओर, सार्वजनिक परिवहन का ढांचा भी चरमरा गया है। सरकारी बसों की संख्या बेहद कम हो चुकी है और वे स्टॉपेज पर रुकती तक नहीं। अतीत की शान रहीं डबल डेकर बसें और देश में इकलौती कोलकाता की पहचान रही ट्राम सेवा अब लगभग दम तोड़ चुकी है।
वर्तमान में मेट्रो, ऑनलाइन कैब और निजी बसें ही शहर की लाइफलाइन हैं। यदि कोलकाता की रफ्तार बहाल करनी है, तो परिवहन के पारंपरिक ढर्रे को सुधारना होगा, साथ ही ऑटो सेवा को सुव्यवस्थित कर हर रूट पर व्यापक रूप से चलाने की जरूरत है। -विशन सिखवाल