

प्रसेनजीत
कोलकाता : गंगा के दो किनारों पर बसे दो क्षेत्रों मुर्शिदाबाद का शमशेरगंज और मालदा का मोथाबाड़ी आज सिर्फ भौगोलिक रूप से ही नहीं, बल्कि एक साझा चिंता से भी जुड़े हुए नजर आते हैं। यह चिंता है मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नामों का हट जाना। इसी पृष्ठभूमि में दोनों विधानसभा क्षेत्रों में मतदान हो रहा है, लेकिन माहौल सामान्य चुनाव जैसा नहीं है।
लोगों में असुरक्षा और नाराजगी
इन इलाकों में लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। यहां सांप्रदायिक तनाव, वक्फ (संशोधन) कानून को लेकर विरोध और गंगा कटाव जैसी समस्याएं पहले ही जीवन को प्रभावित कर रही थीं। अब SIR के तहत हजारों नामों के हटने से लोगों में असुरक्षा और नाराजगी और बढ़ गई है।
स्थानीय स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि कुछ बूथों पर आधे से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से गायब हैं। शमशेरगंज के अलाउद्दीन शेख की कहानी इस स्थिति को और स्पष्ट करती है। कभी चुनाव लड़ चुके अलाउद्दीन इस बार खुद मतदान नहीं कर पा रहे हैं। उनके परिवार के कई सदस्यों के नाम भी सूची में नहीं हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि कई गांवों और परिवारों की साझा पीड़ा बन चुकी है।
SIR से जुड़ा विवाद और कार्रवाई
आंकड़ों के अनुसार, शमशेरगंज में लगभग 74,775 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। वहीं मोथाबाड़ी में भी करीब 37,000 नामों के हटने की चर्चा ने लोगों के बीच बेचैनी पैदा कर दी है। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रही हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी की सक्रियता यहां अपेक्षाकृत कम नजर आ रही है।
आज जब गंगा के दोनों किनारों पर मतदान हो रहा है, तो यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार और अस्तित्व की परीक्षा बन गया है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी आवाज इस बार सिर्फ सुनी ही नहीं जाएगी, बल्कि मानी भी जाएगी।