कृष्ण की नगरी मथुरा : भक्ति और चटकीले रंगों में डूबा रहा पारंपरिक 'हुरंगा' का आयोजन

हुरंगा देवर और भाभी के बीच के रिश्ते का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है
मथुरा में पारंपरिक ‘हुरंगा’ का आयोजन
मथुरा में पारंपरिक ‘हुरंगा’ का आयोजन
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मथुरा : कृष्ण की नगरी मथुरा के बलदेव शहर के ऐतिहासिक श्री दाऊजी मंदिर में बृहस्पतिवार को पारंपरिक ‘हुरंगा’ का आयोजन भक्ति और चटकीले रंगों से सराबोर दिखा। इसमें विदेशी पर्यटकों की भी मौजूदगी रही। लोक मान्यता के अनुसार, हुरंगा देवर और भाभी के बीच के रिश्ते का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है।

प्रशांत ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने सबसे पहले अपने बड़े भाई बलराम की पत्नी रेवती के साथ हुरंगा खेला था। उन्होंने बताया कि परंपरा के मुताबिक, हुरियार कहे जाने वाले स्थानीय पुरुष औरतों को पानी और रंगों से भिगोते हैं, जबकि औरतें अपने देवरों के कपड़े फाड़कर, उन्हें कोड़े बनाकर मजाक में पीटती (बिना चोट पहुंचाए) हैं।

मंदिर के सेवायत प्रशांत ने कहा कि हुरंगा उत्सव के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक रंग तैयार किए गए थे। इन रंगों को तैयार करने में छह क्विंटल से अधिक टेसू के फूल, एक क्विंटल गुलाब के फूल, 21 क्विंटल गुलाल, दो क्विंटल फिटकरी, तीन क्विंटल चूना पत्थर का पाउडर, और 12 क्विंटल केसर के रंग, चंदन और हल्दी का इस्तेमाल किया गया।

प्रशांत ने कहा कि भक्तों पर गुलाल छिड़का गया जिससे मंदिर परिसर होली के चटकीले रंगों से रंगा दिखा। उन्होंने बताया कि गोस्वामी श्री कल्याण देवजी के वंशज, सेवायत पांडे समुदाय के सदस्य, पारंपरिक रूप से दाऊजी मंदिर में हुरंगा खेलते हैं।

प्रसाद ने बताया कि पारंपरिक लहंगा और गहने पहने औरतें समूहों में मंदिर पहुंचीं और होली के गीत गाए। प्रशांत ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि जब सभी देवता मथुरा छोड़कर चले गए, तो श्री कृष्ण के भाई बलराम उस इलाके के रक्षक और रखवाले के तौर पर वहां मौजूद रहे थे। हुरंगा आयोजन के लिए सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए गए थे।

जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्लोक कुमार ने आयोजन शुरू होने से पहले सुरक्षा प्रबंधन का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार को गोवर्धन के मुकुट मुखारविंद मानसी गंगा मंदिर में भी हुरंगा खेला जाएगा।

सेवायत विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि पुरानी परंपरा के तहत ब्राह्मण समुदाय की महिलाएं अपने देवरों के कपड़े फाड़ती हैं, उससे कोड़े बनाती हैं और उन्हें खेल-खेल में पीटती हैं। उन्होंने कहा कि माना जाता है कि यह परंपरा उस समय से चली आ रही है जब भगवान कृष्ण गोपिकाओं के साथ हुरंगा खेलते थे।

शर्मा ने कहा कि यह उत्सव पारंपरिक चरकुला नृत्य के साथ सम्पन्न होता है, जिसमें एक महिला अपने सिर पर मिट्टी के 108 दीयों का संतुलन बनाकर नृत्य करती है।

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