इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी पर FIR दर्ज करने के अपने ही आदेश पर रोक लगाई

ऐसे मामलों में आरोपी को नोटिस देना कानूनी रूप से अनिवार्य है या नहीं
राहुल गांधी
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लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के खिलाफ कथित दोहरी नागरिकता विवाद के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने वाले अपने आदेश पर रोक लगा दी है।

अदालत अब इस बात पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी कि क्या आरोपी को पहले नोटिस देना कानूनी रूप से अनिवार्य था। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने कहा कि वह कोई भी निर्देश पारित करने से पहले नोटिस जारी करने पर कानूनी स्थिति की जांच करेगी।

पीठ ने शुक्रवार को एक मौखिक आदेश में कहा था कि गांधी के खिलाफ प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का मामला बनता है और उत्तर प्रदेश सरकार को एक केंद्रीय एजेंसी को जांच सौंपने की अनुमति दी थी।

यह घटनाक्रम तब हुआ, जब पीठ ने अपने आदेश पर हस्ताक्षर करने से पहले पूर्ण अदालत के एक फैसले को देखा, जिसमें यह अनिवार्य किया गया था कि ऐसे मामलों में प्रस्तावित आरोपियों को नोटिस जारी किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि पिछली सुनवाई के दौरान किसी भी वकील ने इस कानूनी आवश्यकता को उसके ध्यान में नहीं लाया था।

पीठ ने अब मामले में आगे की सुनवाई के लिए 20 अप्रैल की तारीख तय की है। यह आदेश कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस विग्नेश शिशिर द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया था।

शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, भारत के उप सॉलिसिटर जनरल एस बी पांडे ने नागरिकता विवाद से संबंधित केंद्र सरकार के रिकॉर्ड पेश किए थे, जबकि सरकारी वकील वीके सिंह ने राज्य की ओर से प्रस्तुत किया था कि आरोपों से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों का पता चलता है।

विस्तृत सुनवाई के बाद, पीठ ने देखा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से संकेत मिलता है कि गांधी ने कथित तौर पर दोहरी नागरिकता के संबंध में संज्ञेय अपराध किए थे और इस मामले की जांच जरूरी है।

अपनी याचिका में, शिशिर ने आरोप लगाया कि गांधी ब्रिटेन के नागरिक थे और उन्होंने अगस्त 2003 में अपनी राष्ट्रीयता ब्रिटिश के तौर पर घोषित करते हुए मेसर्स बैकॉप्स लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई थी।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि गांधी ने अक्टूबर 2005 और अक्टूबर 2006 में कंपनी के वार्षिक रिटर्न में अपनी राष्ट्रीयता ब्रिटिश बताई थी और कंपनी फरवरी 2009 में भंग कर दी गई थी।

उन्होंने भारतीय न्याय संहिता, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, विदेशी अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी। शिकायत शुरू में रायबरेली में एक विशेष एमपी/एमएलए अदालत के समक्ष दायर की गई थी और बाद में याचिकाकर्ता के अनुरोध पर इसे लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया था।

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