इलाहाबाद हाईकोर्ट में गोहत्या आरोपी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज

हाईकोर्ट ने एनएसए के तहत हिरासत को सही ठहराया
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गो-हत्या के एक आरोपी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी है। आरोपी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की पीठ ने कहा, हमने हिरासत आदेश का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया और पाया कि यह मामला निश्चित रूप से सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा है ना कि कानून व्यवस्था से।

अदालत ने कहा, याचिकाकर्ता को कानून तोड़ने और गोहत्या रोधी कानून का उल्लंघन करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी को भी ऐसा कुछ भी करने का अधिकार नहीं जिससे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो।

अदालत ने कहा, मुस्लिमों को भी हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और ऐसी किसी बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए जिससे सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं। याचिकाकर्ता और उसके साथी किसी अन्य पशु का वध कर सकते थे, लेकिन निश्चित तौर पर गायों का नहीं, क्योंकि इससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता था।

यह याचिका समीर की तरफ से उसके पिता शमशाद द्वारा हिरासत आदेश के खिलाफ दायर की गई थी जिसमें उन्होंने शामली के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 15 मई, 2025 को एनएसए के तहत जारी आदेश को चुनौती दी थी।

इस मामले के तथ्यों के मुताबिक, पुलिस दल 15 मार्च, 2025 को झिनझना थाना अंतर्गत लव्वादाउदपुर गांव के जंगल से गुजर रहा था और उसने संदीप नाम के व्यक्ति के खेत में गायों के क्षत विक्षत शव पाए।

पुलिस ने झिनझना थाना में उत्तर प्रदेश गौहत्या निवारण अधिनियम की धारा 3/8 के तहत मामला दर्ज किया जिसमें कहा गया कि होली पर्व नजदीक था और इस घटना से हिंदुओं में अशांति पैदा हुई।

जांच अधिकारी को 16 मार्च, 2025 को मुखबिर से पता चला कि इस घटना में पांच व्यक्ति इकबाल, जाने आलम, जावेद, वसीम और समीर शामिल थे। इन सभी ने मिलकर घटना को अंजाम दिया था।

अदालत ने कहा, यह बात ध्यान देने योग्य है कि याचिकाकर्ता द्वारा किया गया अपराध साधारण हिंसा किस्म का अपराध नहीं था, बल्कि इस अपराध से आबादी के एक बड़े तबके में आक्रोश पैदा हुआ।

अदालत ने कहा, इस तरह के अपराध की यदि पुनरावृत्ति की जाती है जिसकी पुलिस को पूरी संभावना लगती है, तो इससे इलाके में जीवन की सुचारू गति और उससे भी अधिक सार्वजनिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।

अदालत ने 16 अप्रैल के अपने आदेश में कहा, इन परिस्थितियों में हमारा विचार है कि उक्त आदेश में कोई खामी नहीं है जिसमें एनएसए के तहत याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने का आदेश दिया गया है। इसलिए यह बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका खारिज की जाती है।

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