

आजकल इंटरनेट पर जिस मीम ने लोगों का ध्यान खींचा है, वह है ‘रील मुक्ति केंद्र’ और सच कहें तो यह मज़ाक कम, हकीकत ज़्यादा लगता है।
एक सर्वे के अनुसार, जेन-ज़ी दिन में 150 से अधिक बार अपना फोन चेक कर रही है, जो सामान्य या स्वीकार्य सीमा से कहीं आगे है। यह लत अब चिंता, बेचैनी और ‘फोमो’ यानी 'कुछ छूट जाने के डर' के रूप में सामने आ रही है।
इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि लगभग 56 प्रतिशत युवा गेमिंग, इंटरनेट या सोशल मीडिया में से कम से कम, एक के आदी हैं। वहीं 25 प्रतिशत लोग मोबाइल फोन के पास न होने पर ‘विथड्रॉअल’ (withdrawal) के लक्षण महसूस करते हैं ।
वैश्विक आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर लत को इस तरह परिभाषित करते हैं, "जिसे पाने पर आपको खुशी नहीं मिलती, लेकिन न मिलने पर पीड़ा होती है, वही लत है।"
मदद के उपायों पर आने से पहले, यह समझना जरूरी है कि स्क्रीन की लत वास्तव में हमारे साथ क्या करती है।
जब मन और शरीर को स्क्रीन की आदत हो जाती हैं, तो सबसे पहले हमारी एकाग्रता प्रभावित होती है। लगातार नोटिफिकेशन, स्क्रॉलिंग और त्वरित संतुष्टि के कारण मस्तिष्क उसी लय का आदी हो जाता है और धीरे-धीरे किसी एक विचार या भावना के साथ रूके रहने की क्षमता खो देता है।
डोपामीन (Dopamine) के उतार-चढ़ाव बार-बार होते हैं, परंतु सतही रहते हैं, जिससे बेचैनी, प्रेरणा की कमी और भावनात्मक सुन्नता बढ़ती है।
नींद का चक्र बिगड़ता है, आँखों और गर्दन में तनाव बना रहता है और विश्राम के समय भी तंत्रिका तंत्र सतर्क बना रहता है।
समय के साथ चिंता बढ़ती है, बोरियत असहनीय लगने लगती है और मौन असहज हो जाता है। मन ठहरना, रीसेट होना और 'बस होना' जैसे गुण भूल जाता है।
गुरुदेव कहते हैं, “आज के समय में फोन का उपयोग पानी की तरह हो गया है, यह जीवन का हिस्सा है, लेकिन इसका हर समय उपयोग आवश्यक नहीं है।” उनकी पहली सलाह है, छोटे-छोटे डिजिटल व्रत लें।
“सोने से कम से कम दो घंटे पहले फोन बंद कर दें और सुबह उठने के बाद दो से तीन घंटे तक उसे चालू न करें।”
इससे मन और तंत्रिका तंत्र को दिन शुरू होने से पहले पुनः ऊर्जा प्राप्त करने का समय मिलता है। धीरे-धीरे ये छोटे विराम आपके और आपके फोन के बीच संतुलित संबंध स्थापित करते हैं।
2. लालसा को समझें, तभी उससे मुक्त होंगे
गुरुदेव के अनुसार, “लालसा वस्तु से जुड़ी सुखद स्मृतियों की पुनरावृत्ति मात्र है।” मन उस आनंद को फिर से पाने के लिए भागता है, जो क्षणिक होता है। अंतहीन स्क्रॉलिंग या गेमिंग का सुख थोड़े समय का होता है, जिसके बाद भीतर खालीपन रह जाता है। जब यह समझ आ जाती है कि यह वास्तविक आनंद नहीं, बल्कि स्मृति का खेल है, तब लालसा की पकड़ ढीली होने लगती है।
3. संकल्प के साथ जोड़ें
गुरुदेव बताते हैं कि हमारे पूर्वजों के पास ‘संयम’ की एक सुंदर परंपरा थी, जिसका अर्थ है जागरूकता के साथ आत्म-नियंत्रण। यदि आप संघर्ष कर रहे हैं, तो छोटे कदमों से शुरुआत करें। जैसे संकल्प लें, “अगले सात दिनों तक मैं रात 8 बजे के बाद फोन का उपयोग नहीं करूंगा।” वे अत्यधिक बड़े संकल्पों से बचने की सलाह देते हैं। छोटे, ईमानदार और निभाने योग्य संकल्प ही आपको आगे बढ़ाते हैं। “यदि बीच में चूक हो जाए, तो संकल्प को फिर से दोहराएँ और शुरुआत करें।” यही अभ्यास भीतर से शक्ति और स्वतंत्रता देता है।
4. ऊर्जा को सही दिशा दें
गुरुदेव कहते हैं, “जब जीवन में रस नहीं होता, तब आदतें मन को जकड़ लेती हैं।”
समाधान सरल है, अपनी ऊर्जा को सार्थक दिशा दें। कोई खेल अपनाएँ, संगीत सीखें या कोई नया कौशल विकसित करें। वे कहते हैं, “जब कोई व्यक्ति एक घंटे तैराकी करता है या व्यायाम करता है, तो वह थककर घर लौटता है और गहरी नींद सोता है। सुबह तरोताजा उठता है।” जब शरीर सक्रिय और मन व्यस्त होता है, तब डिजिटल उत्तेजना की चाह अपने आप कम हो जाती है।
5. एक बड़े प्रेम की खोज करें
गुरुदेव बताते हैं कि किसी आदत से छुटकारा पाने के तीन रास्ते होते हैं- भय, लालच और प्रेम। यदि कोई आपको 10 दिन फोन से दूर रहने के बदले बड़ा इनाम दे, तो आप यह कर सकते हैं या यदि डॉक्टर स्वास्थ्य के खतरे की चेतावनी दे, तो भय भी आपको रोक सकता है। लेकिन वे कहते हैं, “ये दोनों स्थायी समाधान नहीं हैं।”
वास्तविक समाधान है एक बड़े प्रेम को खोजना। “जब आपका मन किसी उच्चतर चीज़ से जुड़ जाता है, तो छोटी लालसाएँ अपने आप छूट जाती हैं।” ध्यान, सेवा या रचनात्मकता में मन लगने पर अनावश्यक स्क्रीन उपयोग स्वतः कम हो जाता है।
6. ध्यान, उन प्रश्नों का उत्तर है जो गूगल नहीं दे सकता
डिजिटल जीवन ने हमें कुछ हद तक बाहरी दुनिया से हमारा संबंध विच्छेद कर दिया है। आभासी संबंध बढ़े हैं, लेकिन वास्तविक संबंध कम हुए हैं। इससे अकेलेपन और अलगाव की भावना बढ़ी है। ऐसे में ध्यान एक प्रभावी उपाय है।
गुरुदेव कहते हैं, “आज ध्यान कोई विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है। यह मानसिक स्वच्छता है, जैसे दाँतों की स्वच्छता।” ध्यान हमें केंद्रित करता है, आक्रामकता और अवसाद से दूर ले जाता है। यह मन को नकारात्मक भावनाओं से मुक्त करता है और हमें सम्पूर्ण मानवता से जोड़ता है। जब यह अपनापन जागृत होता है, तब अकेलापन अपने आप मिट जाता है।
एक उच्च दृष्टि
गुरुदेव अक्सर कहते हैं, “युवाओं में अपार ऊर्जा होती है, लेकिन उसे दिशा की आवश्यकता है।” जब यही ऊर्जा सेवा, पर्यावरण संरक्षण, समुदाय निर्माण या रचनात्मक कार्यों में लगती है, तो वह लत और अवसाद से बचाती है। ध्यान विशेष रूप से उस बेचैनी को शांत करता है, जो अनियंत्रित स्क्रॉलिंग की जड़ में होती है और उसकी जगह एकाग्रता और आनंद ले लेता है।
अंतिम सुझाव: ‘स्मार्ट’ से ‘सादगी’ की ओर वापसी
एक बार एक युवा ने गुरुदेव से पूछा, “मैं मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग कैसे छोड़ूं?”
गुरुदेव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “एक दिन के लिए अपने फोन को बिना चार्ज किए ही छोड़ दो।”