

पश्चिम बंगाल की पारंपरिक कांथा कढ़ाई को नई पहचान देने वाली शिल्पी Tripti Mukherjee को इस वर्ष पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 25 मई को आयोजित समारोह में Droupadi Murmu उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान करेंगी।
करीब 37 वर्षों से कांथा कढ़ाई से जुड़ी तृप्ति मुखर्जी ने न केवल इस पारंपरिक कला को संरक्षित किया, बल्कि इसे रोजगार का माध्यम बनाकर ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।
1966 में जन्मीं तृप्ति ने अपनी मां से प्रेरणा लेकर कम उम्र में ही इस कला में रुचि विकसित की। उन्होंने पश्चिम बंगाल के सूरी में एक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया, जहां महिलाओं को कांथा कढ़ाई, साड़ी डिजाइनिंग और वॉल हैंगिंग, बेडशीट, स्टोल व दुपट्टा बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
यहां प्रशिक्षित कारीगर सरकारी मेलों और प्रदर्शनियों में अपने उत्पाद बेचकर स्थायी आय अर्जित कर रही हैं, जिससे कई परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
तृप्ति मुखर्जी ने भारत की इस पारंपरिक कला को वैश्विक मंच पर भी पहुंचाया है।
2017 में उन्होंने ब्रिटेन के बर्मिंघम में कांथा कढ़ाई का प्रदर्शन किया
2025 में टोक्यो में आयोजित इंडिया ट्रेंड फेयर में भारत का प्रतिनिधित्व किया
उनके योगदान को पहले भी कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है:
2010 – राष्ट्रीय पुरस्कार प्रमाण पत्र
2016 – शिल्प गुरु पुरस्कार (वस्त्र मंत्रालय)
2017 – बंगश्री पुरस्कार (पश्चिम बंगाल सरकार)
तृप्ति मुखर्जी का यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प और महिला सशक्तिकरण के लिए एक बड़ी प्रेरणा भी है।