

विशाखा तिवारी
लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद महिला आरक्षण जैसे संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराना सरकार के लिए आसान नहीं दिख रहा है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, कुल 543 सीटों में से एनडीए के पास करीब 293 सांसद हैं, जो साधारण बहुमत के लिए पर्याप्त है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी 2/3 बहुमत से काफी कम है।
ऐसे विधेयकों को पारित करने के लिए लगभग 360 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। इस लिहाज से सरकार को करीब 60-70 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी।
वहीं विपक्षी गठबंधन (INDI Alliance) के पास करीब 233 सांसद हैं। अगर विपक्ष एकजुट रहता है और मतदान में हिस्सा लेता है, तो सरकार के लिए यह बिल पास कराना मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि इस पूरे समीकरण में छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। सरकार को वाईएसआरसीपी, एआईएमआईएम जैसे दलों या अन्य सहयोगियों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, सरकार के लिए एक रणनीतिक राहत यह हो सकती है कि कुछ विपक्षी दल मतदान से दूरी बना लें। अगर तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक या समाजवादी पार्टी जैसे दल वोटिंग में शामिल नहीं होते, तो 2/3 का आंकड़ा कम हो सकता है और सरकार को फायदा मिल सकता है।
मौजूदा स्थिति में करीब 540 सांसदों की उपस्थिति मानें, तो 2/3 बहुमत का आंकड़ा लगभग 360 बनता है। ऐसे में हर वोट की अहमियत बढ़ जाती है।
साफ है कि यह सिर्फ संख्या का मामला नहीं, बल्कि रणनीति और राजनीतिक समझ का भी खेल है। अगर विपक्ष एकजुट रहा, तो सरकार के लिए राह कठिन होगी, लेकिन यदि विपक्ष बंटा या अनुपस्थित रहा, तो यह बिल आसानी से पारित भी हो सकता है।
परिसीमन प्रावधानों का विरोध करने वाले दलों की पूरी सूची:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK)
ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC)
आम आदमी पार्टी (AAP)
समाजवादी पार्टी (SP)
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
राष्ट्रीय जनता दल
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार)
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
सीपीआई (एमएल) लिबरेशन
भारत राष्ट्र समिति