SIR का डर : घरों से निकले वोटर, दिव्यांग और बुजुर्गों ने डाले वोट

हर मुश्किल को पार कर मतदाताओं ने दिखाया अधिकार के प्रति संकल्प
SIR का डर : घरों से निकले वोटर, दिव्यांग और बुजुर्गों ने डाले वोट
Published on

दिव्यांग और 90 पार मतदाताओं का उत्साह बना लोकतंत्र की असली ताकत

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : महानगर में इस वर्ष का चुनाव कई मायनों में खास रहा। मतदान केंद्रों पर न केवल युवाओं की भीड़ देखने को मिली, बल्कि ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे जो वर्षों से वोट देने से दूर थे। खासकर दिव्यांग और बुजुर्ग मतदाताओं की सक्रियता ने यह साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, अपने अधिकार को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ रही है। पहले जहां शारीरिक असमर्थता या उम्र के कारण लोग मतदान से दूरी बना लेते थे, वहीं इस बार उन्होंने हर कठिनाई को पार कर मतदान किया। उनकी सबसे बड़ी चिंता थी कि अगर वोट नहीं दिया तो कहीं उनका नाम मतदाता सूची से कट न जाए।

दिव्यांगों ने दिखाया अधिकार का संकल्प

इस बार कई दिव्यांग मतदाता मतदान केंद्रों पर नजर आये, जो वर्षों से वोट नहीं दे पा रहे थे। बेहला की रचना दास ने सन्मार्ग को बताया कि चलने-फिरने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने लंबे समय से मतदान नहीं किया था लेकिन इस बार उन्हें लगा कि अगर उन्होंने वोट नहीं दिया, तो उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है। इसी आशंका ने उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया। ऐसे ही अशोक साव ने भी बताया कि शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने मतदान किया, क्योंकि उन्हें अपने अधिकार को खोने का डर था। यह स्थिति दर्शाती है कि कई बार व्यवस्था की जटिलताओं या जानकारी की कमी के कारण लोग मतदान से दूर रहते हैं, लेकिन जब उन्हें अपने अधिकार पर खतरा महसूस होता है, तो वे सक्रिय हो जाते हैं।

90 वर्ष से अधिक उम्र के मतदाताओं का जज्बा

दूसरी ओर, 90 वर्ष से अधिक उम्र के मतदाताओं का उत्साह भी देखने लायक था। उम्र के इस पड़ाव पर जहां चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है, वहां मतदान केंद्र तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। इसके बावजूद 93 वर्षीय रामलखन राय हर बार की तरह इस बार भी वोट देने पहुंचे। उनका मानना है कि समाज के विकास के लिए मतदान बेहद जरूरी है। यदि बुजुर्ग ही अपने कर्तव्य से पीछे हट जाएं, तो युवा पीढ़ी को क्या सीख मिलेगी? इसी तरह 92 वर्षीय फैजाम मोहम्मद ने भी कहा कि व्यक्ति को अपने अंतिम समय तक मतदान करना चाहिए। उनका मानना है कि यह केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। इन बुजुर्ग मतदाताओं का उत्साह यह दिखाता है कि लोकतंत्र की असली ताकत लोगों की भागीदारी में ही छिपी है।

logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in