न्यायाधीश बदलने पर फैसला रद्द नहीं किया जाना चाहिए: न्यायमूर्ति नागरत्ना

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने शीर्ष अदालत की बाद की पीठों द्वारा फैसलों को पलटने की हाल की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की।
न्यायाधीश बदलने पर फैसला रद्द नहीं किया जाना चाहिए: न्यायमूर्ति नागरत्ना
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नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि फैसलों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें लिखने वाले न्यायाधीश बदल गए हैं या पद छोड़ चुके हैं। उन्होंने शीर्ष अदालत की बाद की पीठों द्वारा फैसलों को पलटने की हाल की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की।

न्यायमूर्ति नागरत्ना शनिवार को हरियाणा के सोनीपत में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रही थीं।

किसी निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए

उन्होंने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की विकसित समझ यह अपेक्षा करती है कि “हमारा विधिक तंत्र यह आश्वासन दे” कि किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया फैसला समय की कसौटी पर कायम रहे, क्योंकि वह “स्याही से लिखा जाता है, रेत पर नहीं”। उन्होंने कहा, “कानूनी बिरादरी और प्रशासनिक ढांचे के सभी प्रतिभागियों का यह कर्तव्य है कि वे किसी निर्णय का सम्मान करें, केवल कानून में निहित परंपराओं के अनुसार ही आपत्तियां उठाएं और केवल इसलिए उसे खारिज न करें, क्योंकि चेहरे बदल गए हैं।”

शीर्ष अदालत अपने आदेश को वापस ले चुका है

शीर्ष अदालत ने मई में पारित अपने उस आदेश को इस महीने की शुरुआत में वापस ले लिया था, जिसमें विकास परियोजनाओं के लिए पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगा दी गई थी। भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 28 नवंबर को एक बिल्डर एसोसिएशन की समीक्षा याचिका को स्वीकार कर लिया और विभिन्न परियोजनाओं के लिए पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी पर प्रतिबंध हटा दिया।

इसी तरह, सितंबर में शीर्ष अदालत ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के माध्यम से भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड (बीपीएसएल) का अधिग्रहण करने के लिए स्टील प्रमुख जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड की 19,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली को बरकरार रखा, और मई के अपने आदेश को पलट दिया, जिसमें कंपनी के परिशोधन का निर्देश दिया गया था।

कानून के शासन का पालन हर स्थिति में सुनिश्चित हो

वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में एकमात्र महिला न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि न्यायपालिका देश के शासन का अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा, ‘‘उदारीकृत नियमों, व्यापक शक्तियों और विविध उपचारों के साथ, न्यायालय को अक्सर भारतीयों के भविष्य से संबंधित प्रश्नों की एक पूरी शृंखला पर निर्णय लेने के लिए कहा जाता है। आज न्यायपालिका को यह दायित्व निभाने वाला संस्थान माना जाता है कि कानून के शासन का पालन हर स्थिति में सुनिश्चित किया जाए, जब-जब उसका उल्लंघन हो।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बताया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता न केवल न्यायाधीशों द्वारा लिखे गए निर्णयों से सुरक्षित रहती है, बल्कि उनके व्यक्तिगत आचरण से भी सुरक्षित रहती है।

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