

नई दिल्ली : पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने की प्रक्रिया में प्रस्तावित देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से सवाल किए हैं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब विषय सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, तो नियम लागू करने में इतना समय क्यों लगना चाहिए। अदालत ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।
FSSAI ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के लिए सामने की ओर लाल रंग के षट्कोणीय चेतावनी चिन्ह का प्रस्ताव रखा है। इसे सफेद पृष्ठभूमि वाले बॉक्स में प्रदर्शित किया जाएगा। निर्धारित सीमा से अधिक चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों पर संबंधित पोषक तत्व की चेतावनी प्रमुखता से दिखाई जाएगी।
इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को पैकेट खरीदने से पहले उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी आसानी से समझने में मदद करना है।
सुनवाई के दौरान खाद्य नियामक ने बताया कि प्रस्तावित नियमों को अंतिम रूप देने और जारी करने में करीब चार महीने लग सकते हैं। इसके बाद मसौदा नियमों को 60 दिनों के लिए सार्वजनिक कर हितधारकों तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) के माध्यम से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी।
अधिसूचना के बाद खाद्य कंपनियों को नियमों के अनुपालन के लिए 365 दिनों की स्वैच्छिक अवधि देने का प्रस्ताव है।मामले की सुनवाई ‘3एस एंड अवर हेल्थ सोसाइटी’ की याचिका पर हुई है।
याचिका में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FoPL) को अनिवार्य रूप से लागू करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI की पहल को स्वीकार करते हुए समय-सीमा और क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठाए हैं।