बंगाल में भगवा : दशकों बाद विकास की उम्मीद जगी

बदलते बंगाल पर भाजपा नेता एवं उद्योगपति शिशिर बाजोरिया का नजरिया
बंगाल में भगवा : दशकों बाद विकास की उम्मीद जगी
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पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम घोषित हुए 20 दिन हो गए हैं। चारों ओर भाजपा की बंपर जीत, तृणमूल कांग्रेस के पतन और बदलते बंगाल की चर्चा है। इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता एवं उद्योगपति शिशिर बाजोरिया ने न्यूज18 में आलेख लिखा है। इसमें उन्होंने विस्तार से सत्ता परिवर्तन के कारण, प्रभाव और संभावित भविष्य पर चर्चा की है।

शिशिर ने 9 मई के भाजपा सरकार एवं शुभेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण को ऐतिहासिक बताते हुए लिखा कि दशकों का संचित बोझ अपने ही गुरुत्वाकर्षण से ढह गया। उन्होंने इसे मात्र सरकार बदलना नहीं, 1977 में शुरू हुए एक लंबे और पीड़ादायक अध्याय का अंत बताया। इसकी गूंज, कोलकाता या दिल्ली या मुंबई तक नहीं, वाशिंगटन, ब्रुसेल्स, कोपेनहेगन, लंदन और टोक्यो तक पहुंच गई है।

कभी देश का मुकुट रत्न था सोनार बांग्ला

कानून के राज व विकसित भारत का अभिन्न अंग बनने की बंगाल की आशा और आकांक्षा का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा - पश्चिम बंगाल कभी स्वतंत्र भारत का मुकुट रत्न माना जाता था। यह प्राकृतिक संपदा, स्थापित उद्योगों, समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण और बौद्धिक जीवंतता से संपन्न राज्य था। लेकिन दशकों के कुशासन ने सब तबाह कर डाला। 1960-61 में, भारत की जीडीपी में बंगाल की हिस्सेदारी 10.5% थी, जो 2023-24 में घटकर 5.6% रह गई। प्रति व्यक्ति आय 25% से घटकर 2011 और 2025 के बीच राष्ट्रीय औसत के 20% से भी नीचे गिर गई। 6,600 से अधिक कंपनियों ने बंगाल छोड़ दिया। यह गिरावट वामपंथी कुप्रथा के अधीन 34 वर्षों के कुशासन से शुरू हुई, जिसके बाद सत्ता ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली प्रभावी वामपंथी टीएमसी को सौंप दी गई।

उन्होंने लिखा कि कभी शीर्ष पर रहने वाला बंगाल निवेश, प्रभावी शासन और घुसपैठियों से अपने लोगों की सुरक्षा के लिए जूझ रहा था। दशकों तक अवैध घुसपैठ ने जनसांख्यिकीय, सांस्कृतिक और सुरक्षा ताने-बाने को गहराई से बदल डाला। शुरुआत वामपंथियों ने की, ममता की टीएमसी ने वोट बैंक की राजनीति के स्वार्थ में अवैध घुसपैठियों को खुली छूट देने में महारत हासिल कर ली।

SIR का समर्थन करने वाली ममता अब खिलाफ क्यों?

ममता व तृणमूल के पाखंड पर हमला बोलते हुए शिशिर लिखते हैं - 2002 में ममता बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया में 35 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की सराहना की थी। 4 अगस्त 2005 को, तत्कालीन लोकसभा सदस्य ममता बनर्जी सदन में घुस आईं और स्पीकर पर कागजों का एक बंडल फेंकते हुए चिल्लाईं, ‘बंगाल में घुसपैठ आपदा बन चुकी है। मतदाता सूची में बांग्लादेशियों के नाम भरे पड़े हैं, सदन में इस पर कब चर्चा होगी।’ अब वही ममता एसआईआर को ‘जनविरोधी साजिश’ बता रही हैं और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचीं। तृणमूल ने अवैध घुसपैठियों का वफादार वोट बैंक बना लिया था, मतदाता सूची से अवैध घुसपैठियों का हटाया जाना उन्हें राजनीतिक अस्तित्व के लिए खतरा महसूस होने लगा।

9 जिलों में खाता भी नहीं खोल पाई टीएमसी

शिशिर लिखते हैं - 2014 में 1 विधायक से लेकर 2016 में तीन, 2021 में 77 और 2026 में 207 तक, यह परिणाम TMC सरकार के अत्याचार के खिलाफ एक स्पष्ट मतदान और BJP का खुले दिल से स्वागत था। BJP को सभी जिलों में चुनावी सफलता मिली, जबकि TMC नौ जिलों में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। 1951 में स्वतंत्र भारत में पहले चुनाव हुए थे, तब से यह तीसरी बार सरकार परिवर्तन है। 26 साल की कांग्रेस सरकार के बाद, 1977 में CPI(M) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने पहली बार सत्ता परिवर्तन किया, जिसका मुख्य एजेंडा उद्योग-विरोधी था। 2011 में पश्चिम बंगाल में दूसरा बदलाव आया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने वामपंथियों को हराया। ममता इतनी विकास की विरोधी थीं कि सिंगूर से टाटा मोटर्स को हटा दिया, हर साल बिजनेस समिट जरूर किए, पर प्रभावी रूप से निवेश को रोक दिया।

विकास करेगी भाजपा

शिशिर लिखते हैं कि इस बार भाजपा की भारी जीत बेहद सकारात्मक विकासोन्मुखी संकल्प पत्र पर आधारित थी। शुभेन्दु अधिकारी की सरकार राज्य को उद्योग, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा और किसानों की आय में अग्रणी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। भाजपा सरकार ने तुरंत तेजी से कार्रवाई की और अपनी पहली कैबिनेट बैठक में BSF को भूमि सौंप दी, क्योंकि पश्चिम बंगाल के लोग नागरिक-प्रथम शासन के हकदार हैं, और ठीक यही किया जा रहा है। बंगाल में सब था - बंदरगाह, हवाई अड्डा, शिक्षित कार्यबल और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों से निकटता, फिर भी शासन व्यवस्था ने उसे पीछे धकेल दिया था। अब भाजपा सरकार इसे वापस विकास की पटरी पर लाएगी।

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