

भोपाल : मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। क्रॉस वोटिंग की आशंका और कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों के बीच कांग्रेस ने अपने विधायकों को कर्नाटक के बेंगलुरु भेजने का फैसला किया है। पार्टी का कहना है कि यह कदम विधायकों को एकजुट रखने और भाजपा की कथित रणनीति को विफल करने के लिए उठाया गया है।
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दावा किया कि भाजपा कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि कुछ विधायकों ने उन्हें बताया है कि भाजपा से जुड़े लोग ‘नोटों से भरी थैली’ लेकर उनके पास पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया। सिंघार ने भरोसा जताया कि मतदान के दिन भाजपा का पूरा ‘षड्यंत्र’ विफल हो जाएगा।
कांग्रेस विधायक विजय रेवानाथ चौरे ने पुष्टि करते हुए कहा कि पार्टी के सभी विधायक भोपाल से बेंगलुरु रवाना होंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा द्वारा खरीद-फरोख्त की कोशिशों के चलते शीर्ष नेतृत्व ने विधायकों को कांग्रेस शासित राज्य में एक साथ रखने का फैसला लिया है।
राज्यसभा की तीन सीटों में से दो पर भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही है, जबकि तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो गया है। भाजपा ने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ, प्रदेश सचिव रजनीश अग्रवाल और तीसरी सीट के लिए महेश केवट को उम्मीदवार बनाया है। वहीं कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा है।
230 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल प्रभावी संख्या 229 है। भाजपा के पास 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं। एक विधायक भारत आदिवासी पार्टी का है। चुनावी गणित के अनुसार प्रत्येक उम्मीदवार को जीत के लिए 58 वोटों की आवश्यकता होगी।
भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस का आरोप है कि इसी कमी को पूरा करने के लिए भाजपा उसके विधायकों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव के नतीजे केवल संख्या बल पर नहीं, बल्कि विधायकों की एकजुटता और क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं पर भी निर्भर करेंगे। ऐसे में 18 जून का मतदान मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 कांग्रेस विधायकों के भाजपा खेमे में जाने से कमलनाथ सरकार गिर गई थी। इसी अनुभव को देखते हुए कांग्रेस इस बार कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिखाई दे रही है।