माल्टा में मिले तीन गारो शहीदों के कब्रों के निशान

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन की ओर से सेवा देने वाले मेघालय के गारो समुदाय के तीन सदस्यों की कब्रों की पहचान माल्टा में हुई है

माल्टा में मिले तीन गारो शहीदों के कब्रों के निशान
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शिलांग : प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन की ओर से सेवा देने वाले मेघालय के गारो समुदाय के तीन सदस्यों की कब्रों की पहचान माल्टा में हुई है। मेघालय विधानसभा अध्यक्ष थॉमस ए. संगमा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पिएटा मिलिट्री कब्रिस्तान में इन कब्रों की पहचान कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह खोज मेघालय के उस इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने लाती है, जो लंबे समय से आम लोगों की जानकारी से दूर रहा है। अब तक इस कब्रिस्तान में 69वीं गारो लेबर कंपनी के किसी गारो सदस्य की केवल खेव मारक की कब्र को ज्ञात माना जाता था। खेव मारक का निधन 15 जून 1918 को हुआ था। प्रतिनिधिमंडल की हालिया यात्रा के दौरान तीन अन्य गारो सदस्यों—एडिंग मारक, जॉइन मारक और संगजिम संगमा—की कब्रों की भी पहचान की गई। एडिंग मारक और जॉइन मारक की मृत्यु 10 जून 1918 को, जबकि संगजिम संगमा का निधन 19 जून 1918 को हुआ था।

मित्र राष्ट्रों की मदद के लिए गए थे गारो श्रमिक

प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक चला था। उस दौरान ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत से बड़ी संख्या में सैनिकों के अलावा श्रमिकों और सहायक कर्मियों की भी भर्ती की थी। तत्कालीन असम क्षेत्र के गारो समुदाय के लोगों को भी युद्ध से जुड़े विभिन्न कार्यों के लिए संगठित किया गया था। 69वीं गारो लेबर कंपनी इसी तरह की श्रमिक इकाइयों में शामिल थी। इसके सदस्यों का मुख्य काम सीधे युद्ध के मैदान में लड़ना नहीं, बल्कि मित्र राष्ट्रों के सैन्य अभियानों को जरूरी श्रम उपलब्ध कराना था। इन श्रमिकों ने सड़क निर्माण और रखरखाव के साथ-साथ सामान पहुंचाने और अन्य लॉजिस्टिक कार्यों में योगदान दिया।

माल्टा क्यों था महत्वपूर्ण

भूमध्यसागर में स्थित माल्टा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्थान था। यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के बीच समुद्री मार्गों के कारण यहां सैन्य और चिकित्सा गतिविधियां भी महत्वपूर्ण थीं। युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों और सहायक कर्मियों को माल्टा लाया गया था। पिएटा मिलिट्री कब्रिस्तान इसी युद्धकालीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्मारक है। राष्ट्रमंडल के युद्ध कब्र आयोग से जुड़े इस कब्रिस्तान में विभिन्न देशों और क्षेत्रों से आए उन लोगों की कब्रें हैं, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और मित्र राष्ट्रों के युद्ध प्रयासों में योगदान दिया था।

इतिहास के भूले हुए अध्याय से जुड़ी नई जानकारी

मेघालय प्रतिनिधिमंडल के लिए इन कब्रों की पहचान केवल एक ऐतिहासिक खोज नहीं, बल्कि राज्य के लोगों को उनके पूर्वजों के योगदान से जोड़ने वाला अवसर भी है। विधानसभा अध्यक्ष थॉमस ए. संगमा ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने माल्टा में तीन गारो लोगों की कब्रों की सफलतापूर्वक पहचान की है। उनके अनुसार, इन लोगों को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की सहायता के लिए वहां भेजा गया था। उन्होंने युद्ध में जान गंवाने वाले गारो लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह यात्रा मेघालय के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन लोगों की कब्रों का पता चला जिनका योगदान और बलिदान लंबे समय तक व्यापक रूप से सामने नहीं आ सका था।

भारत के योगदान का भी हिस्सा

प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास अक्सर यूरोप के युद्धक्षेत्रों के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन ब्रिटिश भारत ने भी इस युद्ध में बड़ी भूमिका निभाई थी। भारतीय सैनिकों और श्रमिकों ने यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य युद्धक्षेत्रों में ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में योगदान दिया था। गारो लेबर कंपनी की कहानी इसी व्यापक भारतीय योगदान का एक क्षेत्रीय अध्याय है। माल्टा में तीन और कब्रों की पहचान से यह भी संकेत मिलता है कि युद्ध के दौरान पूर्वोत्तर भारत के दूर-दराज के समुदायों के लोग भी वैश्विक संघर्ष की घटनाओं से जुड़े हुए थे। ऐसे दस्तावेज और कब्रिस्तान आज इतिहासकारों के लिए यह समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं कि प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव भारत के विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों तक किस तरह पहुंचा था।

प्रतिनिधिमंडल में ये लोग रहे शामिल

मेघालय के प्रतिनिधिमंडल में विधानसभा के उपाध्यक्ष लिमिसन डी. संगमा, उप मुख्य सचेतक रोनी वी. लिंगदोह, मेघालय पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष मार्थोन जे. संगमा, विधानसभा के सचिव माल्थस एस. संगमा और उप सचिव राजा खरपुरी शामिल थे। इन कब्रों की पहचान मेघालय के इतिहास, गारो समुदाय के वैश्विक युद्धकालीन योगदान और प्रथम विश्व युद्ध में भारत की भूमिका के बीच एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संबंध को सामने लाती है।

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