पाकिस्तान-चीन को UN में बड़ा झटका! अमेरिका ने रोक दिया BLA पर प्रस्ताव

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की कोशिश नाकाम, अमेरिका बोला- BLA और मजीद ब्रिगेड का अल-कायदा या ISIS से कोई लिंक नहीं
पाकिस्तान-चीन को UN में बड़ा झटका! अमेरिका ने रोक दिया BLA पर प्रस्ताव
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न्यूयॉर्क : पाकिस्तान और चीन को संयुक्त राष्ट्र में बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। अमेरिका ने दोनों देशों के उस संयुक्त प्रस्ताव को रोक दिया है, जिसमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र की 1267 आतंकवाद प्रतिबंध सूची में शामिल करने की मांग की गई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने स्पष्ट किया कि BLA और मजीद ब्रिगेड का अल-कायदा या ISIS (ISIL) से कोई प्रमाणित संबंध नहीं पाया गया है। संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के तहत किसी संगठन को सूचीबद्ध करने के लिए उसका इन आतंकी संगठनों से जुड़ा होना जरूरी माना जाता है।

इस फैसले को पाकिस्तान और चीन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। साथ ही इसे भारत के रुख के अनुरूप एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। इससे उन अटकलों पर भी विराम लगा है कि आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका का रुख पाकिस्तान के पक्ष में बदल सकता है।

जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान सेना प्रमुख Asim Munir लंबे समय से BLA और मजीद ब्रिगेड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी संगठन घोषित कराने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने पहले भी बलूच संगठनों को "फितना-अल-हिंदुस्तान" करार देते हुए भारत पर समर्थन देने के आरोप लगाए थे।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी थी पाकिस्तान की सक्रियता

रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने BLA और मजीद ब्रिगेड के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई के लिए अपनी कोशिशें तेज कर दी थीं। पाकिस्तान ने अमेरिका और अन्य देशों के सामने इन संगठनों को वैश्विक आतंकी सूची में शामिल करने की मांग रखी थी।

पिछले साल अमेरिका ने The Resistance Front को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था, जिसे Lashkar-e-Taiba से जुड़ा माना जाता है। इसके बाद पाकिस्तान ने उम्मीद जताई थी कि BLA और मजीद ब्रिगेड के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई हो सकती है।

हालांकि अमेरिका ने भले ही इन संगठनों के खिलाफ अपने घरेलू कानूनों के तहत कुछ कदम उठाए हों, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध सूची में शामिल करने के प्रस्ताव को समर्थन नहीं दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह फैसला केवल कानूनी मानकों पर आधारित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और आतंकवाद से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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