ड्रोन हमले से दहला कुवैत

ईरान ने शुक्रवार को कुवैत की मीना अल-अहमदी तेल रिफाइनरी पर ड्रोन से हमले किए, जिससे वहां आग लग गयी।
मीना अल-अहमदी तेल रिफाइनरी पर ड्रोन से हमले के बाद धुएं का गुब्बार उठता देखा गया।
मीना अल-अहमदी तेल रिफाइनरी पर ड्रोन से हमले के बाद धुएं का गुब्बार उठता देखा गया।
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दुबईः ईरान ने शुक्रवार को कुवैत की मीना अल-अहमदी तेल रिफाइनरी पर ड्रोन से हमले किए, जिससे वहां आग लग गयी। सरकारी कंपनी कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने हमले की पुष्टि करते हुए एक बयान जारी किया और कहा कि दमकलकर्मी आग पर काबू पाने में जुटे हैं। कंपनी ने बताया कि इस हमले में किसी के घायल होने की सूचना नहीं है।

कुवैत में तीन तेल रिफाइनरियां हैं। मीना अल-अहमदी रिफाइनरी पर युद्ध के दौरान कई बार हमला हो चुका है। ये रिफाइनरियां कुवैत के तेल उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके बिना कुओं से निकाले गए तेल को कहीं भेजा नहीं जा सकता और उत्पादन बंद करना पड़ता है। रिफाइनरियों को दोबारा शुरू करना काफी समय लेने वाला काम होता है और जब तक वे फिर से चालू नहीं होतीं, तब तक तेल कुएं बड़े पैमाने पर निष्क्रिय पड़े रहते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नया पैतरा

इधर ईरान ने दावा किया है कि वह ओमान के साथ मिलकर होर्मुज जलडमरूमध्य की ‘‘निगरानी’’ के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर रहा है। सरकारी समाचार एजेंसी ‘आईआरएनए’ ने ईरान के राजनयिक काजिम घारीबबादी के हवाले से बृहस्पतिवार को अपनी खबर में कहा कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य ‘‘इस मार्ग को जहाजों के आवागमन के लिए सुरक्षित और सुगम बनाना तथा बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराना’’ है।

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क्षेत्र में जहाजों पर ईरान के हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए कथित तौर पर 20 लाख अमेरिकी डॉलर तक मांगे जाने ने इस मार्ग को एक तरह से अवरुद्ध कर दिया है। प्रस्ताव का मसौदा क्या है और इसके प्रभाव क्या होंगे, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। ओमान ने भी इस पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के जलक्षेत्र में है, लेकिन इसे एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग माना जाता है और यहां से जहाजों के निर्बाध और स्वतंत्र आवागमन की अपेक्षा की जाती है।

घारीबबादी ने कहा, ‘‘जब हम आक्रामक कार्रवाई का सामना करते हैं तो नौवहन पर गंभीर असर पड़ता है और यह उसी आक्रामकता का नतीजा है। हम इस समय युद्ध में हैं और ऐसे में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि शांतिकाल के नियम युद्धकालीन परिस्थितियों में भी लागू हों।’’

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