हावड़ा में रथयात्रा की धूम: सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम,114 रथों की सुरक्षा संभालेंगे 800 पुलिसकर्मी

Howrah Rath Yatra: 114 Chariots, 800 Cops deployed; Historic Pal Choudhury & Bagui Bari Rath
हावड़ा के घोषपाड़ा में निकलता है ऐतिहासिक रथ
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हावड़ा शहर में इस वर्ष रथयात्रा उत्सव को लेकर प्रशासनिक स्तर पर व्यापक तैयारियां की गई हैं। हावड़ा कमिश्नरेट के डीसी हेडक्वार्टर चंदन घोष ने बताया कि इस बार कमिश्नरेट के अंतर्गत कुल 114 आयोजकों द्वारा भव्य रथयात्रा निकाली जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुगम यातायात के लिए पुलिस कमिश्नरेट मुस्तैद है। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में लगभग 800 पुलिसकर्मियों के साथ भारी संख्या में सिविक पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाएगी।

हावड़ा के पुलिस कमिश्नर (सीपी) अखिलेश चतुर्वेदी सहित आला अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस कैंपों का खुद निरीक्षण करेंगे। बैंटरा, शिवपुर के वैष्णवबाड़ी और इच्छापुर आनंदपुरी आश्रम इलाकों में विशेष मेलों का आयोजन होगा, जिसके लिए अलग से सुरक्षा घेरा तैयार किया गया है। सांकराइल और डोमजूर के हाई रोड पर भीड़ को देखते हुए भारी वाहनों के मार्ग में बदलाव कर यातायात को नियंत्रित किया जाएगा। साथ ही, जगह-जगह स्वास्थ्य और पेयजल शिविर भी लगाए जाएंगे।

बैंटरा का शताब्दी प्राचीन पालचौधरी बाड़ी का रथ

हावड़ा के प्राचीन इतिहास और जमींदारी वैभव का प्रतीक बैंटरा रथतला का पालचौधरी बाड़ी का रथ आज भी लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। इस ऐतिहासिक हवेली के सामने एक सुंदर तालाब और उसके तट पर बना मठ इस विरासत की गवाही देता है। इस परिवार के प्रसिद्ध समाज सुधारक मधुसूदन पालचौधरी के नाम पर ही स्थानीय सड़क का नाम 'एम. एस. पी. सी लेन' और प्रसिद्ध स्कूल का नाम 'बांटरा एम. एस. पी. सी हाई स्कूल' रखा गया है। भले ही समय के साथ जमींदारी का वह जोंक-दमक कम हो गया हो, लेकिन सैकड़ों वर्षों की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और बंगाली संस्कृति के अनुसार निभाई जाती है।

125 वर्ष पुराना घोषपाड़ा का ऐतिहासिक 'बागूई बाड़ी' रथ

हावड़ा के घोषपाड़ा में स्थित 'बागूई बाड़ी' (प्रियनाथ घोष के परिवार) का रथ भी लगभग 125 वर्ष से अधिक पुराना है। जमींदार प्रियनाथ घोष के नेतृत्व में इस रथयात्रा की शुरुआत वर्ष 1897 में हुई थी। पहले यह रथ दो मंजिला विशालकाय हुआ करता था, जिसे सुरक्षा कारणों से वर्ष 1924 के बाद थोड़ा छोटा कर दिया गया। लोहा और सागौन की लकड़ी से बने इस नक्काशीदार रथ को आज भी श्रद्धालु रस्सी से खींचकर हावड़ा मैदान तक ले जाते हैं।

इस रथयात्रा का एक अनूठा इतिहास यह भी है कि लगभग 100 वर्ष पहले रथयात्रा के दिन ही कष्टिपाथर (कसौटी पत्थर) की श्री कृष्ण मूर्ति का पैर खंडित हो गया था, जिसके बाद दोबारा नई कष्टिपाथर की सुंदर मूर्ति स्थापित की गई। रथयात्रा के शुभ दिन राधा-कृष्ण को विशेष अन्न भोग और विभिन्न प्रकार की सब्जियां अर्पित की जाती हैं। तमाम व्यावहारिक दिक्कतों के बाद भी घोष परिवार के वर्तमान सदस्य इस अनमोल धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।

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