

नयी दिल्ली : दिल्ली की एक अदालत ने छेड़छाड़, कपड़े फाड़ने के प्रयास, जबरन घर में घुसने और आपराधिक धमकी के आरोपों में पिता-पुत्र को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और उसके मामले में कई गंभीर विरोधाभास सामने आए।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरविंदर सिंह जग्गी ने प्रमोद उर्फ आकाश और उसके पिता मोहर सिंह को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। दोनों के खिलाफ नेब सराय थाने में फरवरी 2018 में हमला और छेड़छाड़ समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
अदालत ने 25 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि अभियोजन का पूरा मामला अपने ही विरोधाभासों के कारण कमजोर पड़ गया। अदालत के मुताबिक, कथित पीड़िता की गवाही में दोनों आरोपियों को लेकर महत्वपूर्ण अंतर सामने आए।
अदालत ने विशेष रूप से मोहर सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर गौर किया। सुनवाई के दौरान पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि मोहर सिंह ने उसके खिलाफ कुछ नहीं किया। अदालत ने माना कि इस बयान के बाद उनके खिलाफ अभियोजन का मामला टिक नहीं पाया।
वहीं, प्रमोद उर्फ आकाश के संबंध में भी पीड़िता की गवाही में लगातार विरोधाभास पाए गए। अदालत ने इन विसंगतियों को अभियोजन के लिए गंभीर कमजोरी माना।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान अपने आप में मुख्य साक्ष्य नहीं होता। उसका इस्तेमाल गवाही की पुष्टि या उसे खारिज करने के लिए किया जा सकता है। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को विश्वसनीय तरीके से साबित नहीं कर सका।
अदालत ने अभियोजन के मामले में मौजूद विरोधाभासों और जांच से जुड़ी कमियों को देखते हुए प्रमोद उर्फ आकाश और मोहर सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया। फैसले में कहा गया कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करना आवश्यक है। इस मामले में अदालत को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला।