सीमा पर अधूरी फेंसिंग : जमीन नहीं मिलने से कैसे बढ़ती रहीं बीएसएफ की मुश्किलें

नदियों, खेतों और घनी आबादी वाले गांवों से होकर गुजरती है सीमा 127 किमी सीमा क्षेत्र में फेंसिंग के लिए उपलब्ध नहीं हो सकी थी जमीन
सीमा पर अधूरी फेंसिंग : जमीन नहीं मिलने से कैसे बढ़ती रहीं बीएसएफ की मुश्किलें
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केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : भारत-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम मुद्दा रही है। पश्चिम बंगाल में कई हिस्सों में सीमा पर कंटीले तार लगाने का काम वर्षों तक अधूरा पड़ा रहा, जिसकी सबसे बड़ी वजह जमीन हस्तांतरण में देरी बताई जाती रही। बीएसएफ लगातार यह कहती रही कि सीमा से सटे कई इलाकों में जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण निगरानी, गश्त और घुसपैठ रोकने में गंभीर दिक्कतें आती हैं। अब नई भाजपा सरकार ने 45 दिनों के भीतर जरूरी जमीन बीएसएफ को सौंपने का आदेश दिया है।

सीमा के बेहद करीब हैं लोगों के घर

भारत-बांग्लादेश सीमा पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक संवेदनशील मानी जाती है। राज्य के कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदह, मुर्शिदाबाद, नदिया तथा उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में सीमा कई जगह नदियों, खेतों और घनी आबादी वाले गांवों से होकर गुजरती है। कई स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब लोगों के घर, खेती और बाजार मौजूद हैं। ऐसे क्षेत्रों में फेंसिंग के लिए जमीन अधिग्रहण और स्थानीय सहमति बड़ी चुनौती बनी रही।

जमीन नहीं मिलने से क्या-क्या समस्याएं हुईं

1. कई हिस्सों में फेंसिंग अधूरी रह गई

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार करीब 127 किलोमीटर सीमा क्षेत्र में फेंसिंग के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि कई इलाकों में सीमा खुली रही या फेंसिंग बीच-बीच में टूटी हुई स्थिति में रही। ऐसी जगहों को बीएसएफ “vulnerable patches” असुरक्षित मानती रही है।

2. घुसपैठियों को मिला आसान रास्ता

जहां फेंसिंग नहीं थी, वहां रात के समय खेतों, नदी किनारों और गांवों के रास्ते घुसपैठ आसान हो जाती थी। बीएसएफ के पूर्व अधिकारियों के अनुसार खुली सीमा का फायदा उठाकर अवैध रूप से लोग भारत में प्रवेश कर जाते थे और स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाते थे।

3. बीएसएफ को लगातार मानव बल बढ़ाना पड़ा

फेंसिंग नहीं होने पर बीएसएफ को अतिरिक्त जवान तैनात करने पड़ते थे। जहां कंटीले तार और फ्लडलाइटिंग होती है, वहां सीमित बल से निगरानी आसान होती है, लेकिन खुले क्षेत्रों में लगातार पैदल गश्त करनी पड़ती थी।

4. नदी और चर क्षेत्रों में निगरानी मुश्किल

मालदह और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में गंगा तथा अन्य नदियों के कारण कई “चर” और नदीय क्षेत्र बनते हैं। इन जगहों पर जमीन उपलब्ध नहीं होने और भौगोलिक बदलाव के कारण स्थायी फेंसिंग संभव नहीं हो पा रही थी। घुसपैठिये अक्सर इन्हीं नदी मार्गों का इस्तेमाल करते थे। बारिश और बाढ़ के दौरान निगरानी और कठिन हो जाती थी।

5. तस्करी रोकने में परेशानी

सीमावर्ती इलाकों में मवेशी, नकली मुद्रा, नशीले पदार्थ और अन्य अवैध सामान की तस्करी लंबे समय से चुनौती रही है। जिन इलाकों में फेंसिंग अधूरी थी, वहां तस्कर आसानी से रास्ता बदल लेते थे।

6. रात में निगरानी कमजोर पड़ती थी

फेंसिंग वाले क्षेत्रों में सेंसर, फ्लडलाइट और सड़क के जरिए निगरानी आसान होती है लेकिन जहां जमीन नहीं मिली, वहां सीमा सड़क और प्रकाश व्यवस्था भी अधूरी रही। इससे रात में गतिविधियों पर नजर रखना कठिन हो जाता था।

7. स्थानीय विवादों से कार्रवाई प्रभावित

कई जगहों पर फेंसिंग के लिए निजी जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद रहे। कुछ ग्रामीणों को आशंका थी कि फेंसिंग के बाद उनकी खेती सीमा के दूसरी ओर चली जाएगी या आवागमन प्रभावित होगा। इस कारण प्रशासनिक प्रक्रिया लंबी खिंचती रही और बीएसएफ को इंतजार करना पड़ा।

356 एकड़ जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया

2025 में राज्य सरकार की ओर से करीब 356 एकड़ जमीन बीएसएफ को देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। विशेष रूप से मालदह, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और कूचबिहार जिलों के डीएम को निर्देश जारी किए गए थे। अब नई सरकार ने इस प्रक्रिया को तेज करने का फैसला लिया है।

आगे क्या बदलेगा?

यदि लंबित जमीन पूरी तरह बीएसएफ को मिल जाती है, तो:

-सीमा पर लगातार फेंसिंग संभव होगी

-फ्लडलाइट और सड़क निर्माण तेज होगा

-निगरानी तकनीक बेहतर तरीके से लगाई जा सकेगी

-घुसपैठ और तस्करी पर नियंत्रण आसान होगा

-जवानों पर अतिरिक्त दबाव कम होगा

सीमा सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल फेंसिंग ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन अधूरी सीमा को बंद करना घुसपैठ रोकने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक माना जाता है।

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