प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है एरोमाथेरेपी

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● चिकित्सा शास्त्र के जनक हिप्पोक्रेट्स ने भी कुछ रोगों के लिये सुगंधित स्नान और मालिश की बात कही थी। अरब के महान चिकित्सा शास्त्री अविसेना ने दसवीं शताब्दी में गुलाब जल बनाने की विधि-ढूंढकर आधुनिक इत्र निर्माण की शुरूआत की थी जो कि हमेशा से अमीर उमरावों का शौक रहा है।

एरोमा का अर्थ है भीनी सुगंध और थेरेपी कहते हैं औषधियों से उपचार को। एरोमाथेरेपी जड़ी बूटियों से शरीर और दिमाग को रोगमुक्त रखने के लिए पौधों से निकाले अर्क के जरिए इलाज करने की सुरक्षित पद्धति है। इसे एक चमत्कारी चिकित्सा पद्धति माना जाता है।

एलोपैथी के दुष्प्रभावों से परेशान लोग वैकल्पिक चिकित्सा की खोज में रहते हैं। ऐसे में एरोमाथेरेपी की ओर उनका आकर्षण समझ में आता है। एरोमा थेरेपी हजारों साल पुरानी चिकित्सा पद्धति है। इसे आधुनिक विज्ञान भी महत्त्व देने लगा है। वैदिक काल में यौवन को बरकरार रखने और लंबी आयु के लिए इस थेरेपी का इस्तेमाल होता था। शायद इसीलिए तब लोग स्वस्थ और दीर्घायु हुआ करते थे। वे प्रकृति के अधिक निकट थे।

एरोमाथेरेपी का संबंध दो बातों से है। पहला तो सुगंध को घ्राणशक्ति से श्वास द्वारा दिमाग तक पहुंचाना, दूसरा तरीका है स्पर्श द्वारा ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करना। ये दोनों तरीके तन मन को बैंलेंस में लाने में सहायक हैं जो इस इलाज का मुख्य उद्देश्य है।

फूलों से निकले तेल की मालिश करने से रक्तसंचार बढ़ता है। सुगंधित तेल की खुशबू सूंघने से मानसिक स्थिति में पॉजिटिव चेंज आ जाता है। जब इस अर्क से भाप लेते हैं तो यह नाक के जरिए भीतर जाकर दिमाग के पहले हिस्से को प्रभावित करता है जो हमारी भावनाओं, इच्छा और यादों के लिए जिम्मेदार है।

सौंदर्य उपचार में एरोमाथेरेपी का उपयोग बढऩे लगा है। आज की महिलाएं अपने सौंदर्य को लेकर काफी जागरूक हैं। सिंथेटिक कॉस्मेटिक्स कई बार एलर्जी पैदा कर देते हैं। इनका इस्तेमाल हमेशा सेफ नहीं होता। कभी एक्सपायरी होने पर तो ये काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं जबकि सौंदर्य उपचार में चंदन का तेल, गुलाब और मोगरा आदि फूलों के अर्क का बहुतायत से प्रयोग होता है।

ड्राई स्किन के लिए अर्क तेल मिले पानी से नहाने के बाद एरोमेटिक मालिश की जाती है। आराम के लिए -साइप्रस एवं रोज, टॉनिक के लिए, बासिल एवं रोजमेरी और ताजगी के लिए लेवेंडर एवं लेमन का प्रयोग होता है। लेवेंडर, लेमन ग्रास, लेमेन, जिरेनियम, पाइन के अर्क माहौल को हल्का और शांत बनाते हैं। सर्दी, कफ, साइनस, जुकाम के लिए युकलिप्टस, बेन्जाइन, पाइन की भाप ली जाती है।

सिरदर्द के लिए पिपरमिंट का प्रयोग होता है। चूंकि ये बैक्टीरियारोधी और एंटीसेप्टिक किस्म के होते हैं, ये किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते। त्वचा के लिए गुलाब की पंखुड़ियों से निकाला गया तेल कारगर है। इसी तरह चमेली के तेल को हर तरह की त्वचा की देखभाल में इस्तेमाल किया जा सकता है। गुलदाउदी का तेल बच्चों की नर्म नाजुक स्किन के लिए स्वास्थ्यवद्र्धक माना जाता है।

मानसिक तनाव एवं इससे उपजने वाली अन्य बीमारियों के लिये एरोमाथेरेपी का सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता है। चमेली, नींबू, संतरा, गुलाब, चंदन आदि के तेल की कुछ बूंदें पानी में डालकर उससे किया गया स्नान मानसिक तनाव को काफी हद तक दूर करता है। फूलों के तेल की कुछ बूंदें पानी में डालकर उबालने से पूरा वातावरण महक उठता है। यह बनावटी स्प्रे से लाख दर्जे बेहतर हैं।

इसमें दक्ष लोग ही एरोमाथेरेपी कर सकते हैं। वे इसमें प्रशिक्षित होते हैं। यह मुश्किल नहीं है। एक शॉर्ट कोर्स करके ही इसे सीखा जा सकता है।

अब तो यह थेरेपी संसार भर में लोकप्रिय हो रही है लेकिन चीन का इस थेरेपी के विकास में विशेष योगदान है। चीन ने ही एरोमा जड़ी बूटियों और एरोमा तेल को चिन और यांग का अलग-अलग नाम दिया है।

चिकित्सा शास्त्र के जनक हिप्पोक्रेट्स ने भी कुछ रोगों के लिये सुगंधित स्नान और मालिश की बात कही थी। अरब के महान चिकित्सा शास्त्री अविसेना ने दसवीं शताब्दी में गुलाब जल बनाने की विधि-ढूंढकर आधुनिक इत्र निर्माण की शुरूआत की थी जो कि हमेशा से अमीर उमरावों का शौक रहा है।

निस्संदेह सुगंधों का शौक हमारे सौंदर्य बोध की खास पहचान है। सुगंधों से प्यार यानी जीवन की सुंदरता की उपासना है और यही उपासना जब रोग भी भगाने लगे तो इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।

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