

कोलकाता - बदलता हुआ मौसम, यानी एक मौसम का दूसरे मौसम से मिलना ऋतु-संधि काल कहलाता है। भारत जैसे देश में जहां छह ऋतुएं हैं, हर दो-तीन महीने बाद मौसम का मिजाज बदल जाता है, यानी यहां पर छह ऋतु संधियां पड़ती हैं एक बरस में। छह ऋतुएं कालक्रम में बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर एक-एक करके एक के बाद एक अस्तित्व में आती हैं, परवान चढ़ती हैं और ढल जाती हैं। किसी भी एक ऋतु का आगमन दूसरी ऋतु के जाने का कारण बनता है। यही काल ऋतु संधि काल के नाम से जाना जाता रहा है।
ऋतु संधिकाल में सतर्कता जरूरी
हर मौसम का अपना अलग ही खान-पान एवं पहनावा है और एक तरह से ऋतु परिवर्तन जीवन को नीरस होने से बचाता है। रस बांटते और रस समेटते मौसमों के मध्य फैशन, आधुनिकता और लापरवाही के चलते कई बार खुशी भी दुःख व गम में बदल जाती है। खासतौर पर स्वास्थ्य की दृष्टि से ऋतु संधि काल अधिक सतर्कता की मांग करते हैं।
तन स्वस्थ तो मन स्वस्थ
‘तंदुरुस्ती हजार नेमत’ की कहावत गलत नहीं है। यदि तन स्वस्थ है तो मन आनंदित एवं उल्लासमय रहता है। यदि शरीर स्वस्थ, बलवान एवं निरोगी है तो मौसम के बदलते मिज़ाज का पता नहीं चलता अन्यथा सुखद लगने वाला बदलता मौसम परेशानी का सबब भी बन जाता है। युवा एवं ऊर्जावान युवकों की रोग प्रतिरोधी क्षमता काफी अधिक होती है अतः ऋतु संधिकाल उन पर ज्यादा असर नहीं डाल पाता मगर बच्चे और बूढ़े यदि इस ऋतु-संधिकाल में पर्याप्त सावधानी न रखें तो उन्हें बदलता मौसम परेशान किए बगैर नहीं छोड़ता।
बच्चों की सेहत पर ध्यान जरूरी
दरअसल यह बदलता मौसम बहुत नाजुक होता है। ऊर्जा से भरे इस मौसम में बच्चे अपेक्षाकृत गर्मी का अनुभव करते हैं और सुबह शाम भी उचित कपड़े पहनने में आनाकानी करते हैं। खास तौर पर छह से आठ बरस तक के बच्चे इस काल संक्रमण में गुलाबी ठण्ड के शिकार हो जाते हैं। प्रायः कमजोर, न्यूमोनिया के शिकार, सांस रोग के मरीज बच्चे तथा अपनी या मां-बाप की देखरेख में होने वाली लापरवाही के चलते कोल्ड एलर्जी के शिकार हो जाते हैं।
जुकाम, कोल्ड एलर्जी या इन्फ्लूएंजा के प्राथमिक लक्षणों में शरीर में हल्का दर्द होना, शरीर में सुस्ती या अकड़न का अनुभव, उनींदा महसूस करना, खेलने खाने में रुचि न रहना, आंखों में भारीपन व जलन, तापमान का बढ़ना जिसे आम भाषा में बुखार के नाम से जाना जाता है। इसके बाद नाक में हल्की सी खुजली, गले में खिच-खिच यानी खराश, पानी की अधिक प्यास लगना, खुश्की का अनुभव करना आदि लक्षण देखे जाते हैं। अतः ऋतु संधिकाल में बच्चे का पर्याप्त ध्यान रखे जाने की जरूरत होती है।
उपचार से सावधानी भली
उपचार से सावधानी भली के सिद्धांत पर चलना समय की मांग और बुद्धिमानी है। थोड़ी सी सावधानी बरत कर आप अपनी और अपने नन्हे-मुन्ने की तकलीफ दूर कर सकती हैं। ऋतु संधिकाल में बीमार पड़ने से बचने के लिए हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा। फास्ट फूड और बेमौसमी फलों, व्यंजनों आदि से बचते हुए प्रकृति के अनुपम उपहारों का प्रयोग, समयानुरूप खाना, पीना, भोजन, पानी, कपड़े प्रयोग में लाएं तो ऋतु संधिकाल एक संकट व संक्रमण काल नहीं अपितु एक स्वास्थ्यप्रद माहौल लेकर आएगा।