

श्री राधा जन्माष्टमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी यह कोई मात्र संयोग नहीं बल्कि उनके अलौकिक पवित्र प्रेम का ऐसा सच्चा संबंध है जो एक गहरे आध्यात्मिक यात्रा की ओर संकेत करता है। दोनों की आत्मा में संपूर्ण पवित्र प्रेम, निर्मलता, समर्पणता, सार-गर्भित ज्ञान, त्याग और आनन्द के गुणों की समानता पूर्ण रूप से दिखाई देती है जैसे दोनों की आत्मा एक है, एक जन्म, एक मत, एक बल, एक भरोसा, एक आदि सनातन देवता धर्म। प्रत्येक मनुष्य मूलतः एक चैतन्य शक्ति आत्मा है जिसका स्वधर्म है शांति, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, सुख और आनन्द। पर जब हम आत्मा प्रकृति के पाँच तत्वों की देह को धारण कर इस सृष्टि रंगमंच पर जन्म-पुनर्जन्म पार्ट प्ले करने आते हैं तो स्वयं को चैतन्य आत्मा भूल देह, देह के संबंध, भौतिक आकर्षणों में उलझ जाते हैं तब हमारे आत्मा के पिता परमात्मा निराकार चैतन्य ज्योतिबिंदु स्वयंभू स्वयं इस भू पर आकर हमें अज्ञान अंधकार की कलियुगी दुनिया में देहअहंकार का ज्ञान देते हैं, और अपना यथार्थ परिचय देते हुए आत्मा के निज गुणों की सुंदरता की स्मृति दिलाते हैं। राजयोग के अभ्यास द्वारा हमें उन सत्य गुणों में स्थित कराते हैं, एक दिन के त्यौहार को मनाने की खुशी के बजाय पूरे जीवन को महोत्सव के रूप में सच्ची खुशी और आनंद से भरपूर कर देते हैं।
दोनों परमात्मा की बगिया
श्री राधा और श्रीकृष्ण दोनों परमात्मा की बगिया के वो सुंदर, खुशबूदार, आकर्षणमूर्त फूल हैं जिनमें आत्मिक गुणों की सुंदरता और समानता की झलक पूर्ण रूप से दिखाई देती है। कृष्ण के सिर का मयूर पंख प्रकृति की सहज सुंदरता और पवित्रता का प्रतीक है तो राधा का स्वरूप प्रेम की पवित्रता के साथ निर्मलता और समर्पणता का प्रतीक। एक की मुरली की धुन में सुख, चैन और मधुरता समाई है तो दूसरे के प्रेम में मधुर अनुभूति और उसमें समाया भाव। लौकिक दुनिया के सीमित मोह से न्यारे और अलौकिक आत्मा के असीमित निश्चल प्रेम से जोरे, हमें राधा-कृष्ण के मीठे संबंधों में आदर्श के रूप में दिखाई देता है। यहाँ मोह नहीं प्रेम है, प्रेम में अधिकार नहीं -आत्मिक निकटता है, आकर्षण नहीं, अपेक्षा नहीं अपितु आत्मा का आत्मा और परमात्मा से सच्चा मिलन और योग है। इसीलिए ही कृष्ण को योगेश्वर कहते हैं। प्रेम ही सत्य है, शाश्वत है, समर्पण है, सेवा है, त्याग है, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् है। श्रीकृष्ण, श्रीराधा की यह सार्थक जन्माष्टमी सच्चे प्रेम की उस ऊँचाई का गहराई का प्रतीक है जो पूरे विश्व की आत्माओं को सच्चे मायने में जीने की कला का संदेश देती है, सत्य की ओर ले जाती है।
दोनों की जन्माष्टमी का अर्थ
दोनों की जन्माष्टमी यह आठ और आठ मिलाकर सोलह होते हैं जो कि संपूर्णता का प्रतीक है। जैसे कहा जाता है "16 आना, 16 कला, 16 शृंगार"। यह इन देवी-देव आत्माओं की संपूर्णता का प्रतीक है। कहते हैं न, राधे बिन श्याम आधा और राधा है वह जिसने स्वयं को साधा । यह भी कह सकते हैं कि यह श्री राधे, श्री कृष्ण आत्मा और परमात्मा के उस मिलन का प्रतीक हैं, जिससे आत्मा संपूर्णता को प्राप्त करती है। राधे कृष्ण दोनों मिलकर श्री लक्ष्मी और श्री नारायण के रूप में श्री विष्णु का स्वरूप हैं (जिसमें अणु मात्र भी negative का विष ना हो) जो कि पुरुषोत्तम, सर्वगुण संपन्न, संपूर्ण पवित्र, 16 कला संपूर्ण हैं। अर्थात् आत्मा की सर्वोच्च स्थिति के सूचक हैं। दोनों की महाजन्माष्टमी हमें प्रेरणा देती है कि हमारे जीवन में भी भौतिक आकर्षण की जगह आत्मिक जुड़ाव हो, अपेक्षा की जगह सम्मान हो, अधिकार की जगह समर्पण हो, और सीमित 'मैं' से आगे बढ़कर समस्त जीवन के प्रति प्रेम और मंगलभाव हो।