पंडाल सजाकर चलता है जीवन का सफर, हर त्योहार और शादी का सच्चा हमसफर

अधिकतर पश्चिम मिदनापुर जिले से जुड़े हैं कारीगर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों का भी करते हैं दौरा
कारीगर लक्ष्मण माइती
कारीगर लक्ष्मण माइती
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राम बालक, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कोलकाता की भव्य दुर्गा पूजा के पंडाल देश-विदेश से आने वाले दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। लेकिन इन खूबसूरत कलाकृतियों के पीछे काम करने वाले कारीगरों का जीवन बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण होता है। अधिकांश कारीगर पश्चिम मिदनापुर जिले से आते हैं, जो पूरे साल पंडाल सजाने और बनाने में जुटे रहते हैं। इनमें से एक हैं लक्ष्मण माइती, जो दांतन गांव के निवासी हैं और वर्तमान में कोलकाता के बाटानगर न्यू लैंड दुर्गा पूजा पंडाल में काम कर रहे हैं। लक्ष्मण बताते हैं कि एक बड़े बजट के पूजा पंडाल को तैयार करने में तीन महीने तक का समय लगता है। इस दौरान वे अपने परिवार से दूर रहकर दिन-रात मेहनत करते हैं। दुर्गा पूजा के बाद वे बासंती पूजा, काली पूजा और शादी-ब्याह के पंडाल बनाने में जुट जाते हैं। यही उनका और उनके साथियों का साल भर का मुख्य रोजगार है। इन कारीगरों के लिए यह काम न केवल हुनर की मांग करता है, बल्कि इसके साथ कई जोखिम भी जुड़े होते हैं। पंडाल निर्माण के दौरान ऊंचाई पर काम करना, बिजली का असुरक्षित इस्तेमाल और समय सीमा का दबाव इनके रोजाना के काम का हिस्सा हैं। करीब-करीब ये कारीगर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में भी काम के लिए जाते हैं। ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं, इसलिए यह काम उनके लिए जीवनयापन का जरिया है। हालांकि, यह रोजगार स्थायी नहीं होता, और कई बार असुरक्षा के कारण इस क्षेत्र में नए श्रमिकों की संख्या भी कम होती जा रही है। राज्य सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाएं इन कारीगरों को थोड़ी राहत जरूर देती हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। इसके बावजूद, ये गुमनाम नायक हर साल लाखों लोगों की आस्था और कला के इस महोत्सव को जीवंत बनाए रखते हैं। इनके बिना न तो पूजा संभव है और न ही त्योहारों की रंगत। पंडाल के पीछे छुपी इस मेहनत को समझना और उसका सम्मान करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

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