मातृत्व से जुड़ी मानसिक चुनौतियों पर खुलकर हुई चर्चा

Annantaa ने आयोजित किया जागरूकता सत्र
माधुरी सारदा : परामर्श मनोवैज्ञानिक और नैदानिक ​​सम्मोहन चिकित्सक ; अन्नंता के संस्थापक, डॉ. इंद्राणी लोध : संस्थापक निदेशक, उर्वरा ग्रुप ऑफ वुमेन क्लीनिक, 
डॉ. बासब मुखर्जी : प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, विधि बंसल : सह-संस्थापक और मनोचिकित्सक, अन्नंता
माधुरी सारदा : परामर्श मनोवैज्ञानिक और नैदानिक ​​सम्मोहन चिकित्सक ; अन्नंता के संस्थापक, डॉ. इंद्राणी लोध : संस्थापक निदेशक, उर्वरा ग्रुप ऑफ वुमेन क्लीनिक, डॉ. बासब मुखर्जी : प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, विधि बंसल : सह-संस्थापक और मनोचिकित्सक, अन्नंता
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सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : मातृत्व से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर लंबे समय से बनी चुप्पी को तोड़ने की दिशा में अनंत्ता ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए एक विशेष जागरूकता सत्र का आयोजन किया, जिसमें विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित वक्ताओं ने मातृत्व के भावनात्मक और मानसिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। मातृ मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता सप्ताह 2026 के अवसर पर आयोजित इस सत्र की वैश्विक थीम “ए डिकेड ऑफ वोइसेस्” थी, जो मातृ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पिछले दस वर्षों में वैश्विक स्तर पर हुए जागरूकता अभियानों और संवादों को रेखांकित करती है। इस सत्र में गर्भावस्था, प्रसव के बाद की परिस्थितियों तथा मातृत्व के विभिन्न चरणों में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों पर विशेष रूप से चर्चा की गई।

गर्भावस्था, प्रसवोत्तर समय और मातृत्व से जुड़ी मानसिक चुनौतियों पर चर्चा करते हुए प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं प्रसूति चिकित्सक डॉ. बासब मुखर्जी तथा महिलाओं के क्लीनिक समूह उर्वरा की संस्थापक निदेशक डॉ. इंद्राणी लोध ने कहा कि लाखों महिलाएं मानसिक और भावनात्मक दबाव को चुपचाप झेलती रहती हैं। उन्होंने मातृ मानसिक स्वास्थ्य के लिए समय पर परामर्श, आसान काउंसलिंग सुविधाएं, मजबूत भावनात्मक सहयोग प्रणाली और अधिक संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता पर बल दिया।

वैश्विक स्तर पर मातृ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच यह सत्र और भी प्रासंगिक हो गया। वर्ष 2025 और 2026 की अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य रिपोर्ट्स और मातृत्व संबंधी शोधों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग हर पांच में से एक महिला गर्भावस्था या बच्चे के जन्म के पहले वर्ष के भीतर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित होती है। हर वर्ष विश्वभर में लगभग 140 मिलियन बच्चों के जन्म के साथ करीब 28 मिलियन महिलाएं पेरिनेटल मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। शोधों में यह भी सामने आया कि वैश्विक स्तर पर लगभग 10 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अवसाद या चिंता संबंधी विकारों से प्रभावित होती हैं, जबकि विकासशील देशों में यह आंकड़ा 15.6 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। वहीं प्रसवोत्तर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं दुनिया भर में लगभग 13 प्रतिशत नई माताओं को प्रभावित करती हैं, जबकि विकासशील देशों में यह संख्या करीब 19.8 प्रतिशत तक दर्ज की गई।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि मातृ मानसिक स्वास्थ्य के उपचार को लेकर गंभीर अंतर बना हुआ है, जहां लगभग 75 से 85 प्रतिशत महिलाएं सही निदान या उपचार तक नहीं पहुंच पातीं। इसके पीछे सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी, पारिवारिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच जैसी वजहें जिम्मेदार हैं। भारतीय अध्ययनों का उल्लेख करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि देश में पेरिनेटल अवसाद के मामले 14 प्रतिशत से 45 प्रतिशत तक पाए गए हैं, जिनके पीछे आर्थिक दबाव, शहरी जीवनशैली, पारिवारिक अपेक्षाएं और भावनात्मक अकेलापन जैसे कारण प्रमुख रूप से सामने आए हैं।

इस अवसर पर Annantaa की संस्थापक, काउंसलिंग मनोवैज्ञानिक एवं क्लिनिकल हिप्नोथेरेपिस्ट माधुरी सरदा ने कहा, “अक्सर माताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे गर्भावस्था और मातृत्व के हर चरण में भावनात्मक रूप से मजबूत बनी रहें, लेकिन बहुत कम लोग उन मानसिक और भावनात्मक संघर्षों को समझ पाते हैं, जिनसे महिलाएं इस पूरी यात्रा के दौरान गुजरती हैं। मातृ मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्व, संवेदनशीलता और देखभाल मिलनी चाहिए, क्योंकि एक मां का भावनात्मक स्वास्थ्य सीधे तौर पर उसके जीवन और बच्चे के विकास को प्रभावित करता है।”

माताओं के लिए भावनात्मक सहयोग के महत्व पर जोर देते हुए Annantaa – पावर ऑफ द माइंड की सह-संस्थापक एवं मनोचिकित्सक विधि बंसल ने कहा, “मातृत्व से जुड़ी चर्चाएं अक्सर केवल शारीरिक देखभाल तक सीमित रह जाती हैं, जबकि भावनात्मक संघर्षों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। परिवार, कार्यस्थल और समाज को ऐसे सुरक्षित वातावरण बनाने की आवश्यकता है, जहां माताएं बिना किसी डर या संकोच के अपनी बात रख सकें और जरूरत पड़ने पर पेशेवर सहायता लेने में सहज महसूस करें।”

विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि मातृ मानसिक स्वास्थ्य केवल प्रसवोत्तर अवसाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चिंता संबंधी विकार, आघात से जुड़ा तनाव, भावनात्मक थकावट और प्रसवोत्तर मनोविकृति जैसी गंभीर स्थितियां भी शामिल हैं। चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि नींद की कमी, रिश्तों में तनाव, करियर का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं आज भी माताओं के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर रही हैं। विशेषज्ञों ने मजबूत पारिवारिक सहयोग, भावनात्मक समझ और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यापक स्वीकृति की आवश्यकता पर जोर दिया।

मातृ मानसिक स्वास्थ्य आज भी दुनिया के सबसे कम चर्चित स्वास्थ्य मुद्दों में से एक बना हुआ है। ऐसे में Annantaa की यह पहल मातृत्व के भावनात्मक पक्ष को लेकर जागरूकता, संवेदनशीलता और सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। विशेषज्ञों, संवादों और वास्तविक चिंताओं को एक मंच पर लाकर इस सत्र ने न केवल माताओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य बनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया, बल्कि यह संदेश भी मजबूत किया कि भावनात्मक स्वास्थ्य को मातृत्व देखभाल और सार्वजनिक स्वास्थ्य विमर्श का एक अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

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