पर्यावरण संग आस्था: जूट थीम वाले जगद्धात्री पूजा पंडाल को मिलेगा राष्ट्रीय सम्मान

वस्त्र मंत्रालय, राष्ट्रीय जूट बोर्ड की अनोखी पहल पहली बार जूट से बने जगद्धात्री पूजा पंडाल को मिलेगा पुरस्कार चंदननगर, रिसड़ा और कृष्णानगर में हो रही शुरुआत
राष्ट्रीय जूट बोर्ड के सचिव शशि भूषण सिंह
राष्ट्रीय जूट बोर्ड के सचिव शशि भूषण सिंह
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रामबालक, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : परंपरा और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने की दिशा में वस्त्र मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय जूट बोर्ड ने एक नई और सराहनीय पहल शुरू की है। पहली बार जगद्धात्री पूजा के अवसर पर जूट से सजे पंडालों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य है—पूजा आयोजनों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना और जूट जैसे स्वदेशी, प्राकृतिक एवं पुन: उपयोग योग्य उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देना। इस प्रतियोगिता में हुगली जिले के चंदननगर, रिसड़ा और नदिया जिले के कृष्णानगर की प्रमुख पूजा समितियाँ हिस्सा ले रही हैं। राष्ट्रीय जूट बोर्ड के सचिव शशि भूषण सिंह ने बताया कि इससे पहले कोलकाता में जूट-आधारित दुर्गा पूजा पंडालों को सम्मानित किया गया था और अब यह प्रयास जगद्धात्री पूजा तक विस्तारित किया जा रहा है। प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार, प्रत्येक भाग लेने वाली समिति को अपनी सजावट में कम से कम 200 मीटर जूट कपड़ा, 25 किलोग्राम जूट की रस्सी या धागा, या 25 किलोग्राम कच्चा जूट अथवा इन तीनों के मिश्रण का उपयोग अनिवार्य रूप से करना होगा। पंडालों का मूल्यांकन नवाचार, कलात्मकता और जूट के उपयोग की मात्रा के आधार पर किया जाएगा। राष्ट्रीय जूट बोर्ड द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति स्थल निरीक्षण करेगी, और निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम माना जाएगा। निरीक्षण के समय आयोजकों को जूट की खरीद से संबंधित बिल या इनवॉयस प्रस्तुत करना होगा।

विजेताओं को मिलेंगे आकर्षक नकद पुरस्कार, 17 अक्टूबर तक जमा करनी होगी प्रविष्टियाँ

प्रतियोगिता में विजेता समितियों को नकद पुरस्कार भी दिए जाएंगे — प्रथम पुरस्कार 1.5 लाख रुपये, द्वितीय 1 लाख रुपये, तृतीय 75 हजार रुपये, और पाँच सांत्वना पुरस्कार, प्रत्येक 25 हजार रुपये के होंगे। सभी प्रतिभागी पूजा समितियों को अपनी प्रविष्टियाँ 17 अक्टूबर तक जमा करनी होंगी। राष्ट्रीय जूट बोर्ड का यह प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं को एक नई पहचान देने वाला भी साबित होगा। इस पहल से पूजा आयोजनों में प्लास्टिक और अन्य प्रदूषणकारी सामग्रियों के उपयोग में कमी आएगी, साथ ही राज्य के जूट उद्योग को भी नई ऊर्जा मिलेगी।

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