

सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : देश में आलू उत्पादन के मामले में पश्चिम बंगाल वर्तमान में दूसरे स्थान पर आता है, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले आलू बीजों के लिए इसे लंबे समय से पंजाब पर निर्भर रहना पड़ता था। अब इस निर्भरता को खत्म करने और बंगाल को आलू उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच एक विशेष समझौता (MoU) हस्ताक्षरित हुआ है। इस पहल से उत्तर बंगाल के कृषि क्षेत्र और स्थानीय किसानों को सीधा बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।
इस समझौते के तहत शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) की ओर से पश्चिम बंगाल में आलू बीज उत्पादन के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसी क्रम में सितंबर महीने में बंगाल के कृषि विभाग के विशेषज्ञ शिमला जाएंगे, जहां वे बीज उत्पादन की उन्नत तकनीक सीखेंगे। इसके बाद नवंबर में CPRI की विशेषज्ञ टीम पश्चिम बंगाल का दौरा करेगी। प्राथमिक तौर पर CPRI ने उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग और कूचबिहार के इलाकों को आलू बीज उत्पादन के लिए चिह्नित किया है। CPRI के निदेशक ब्रजेश सिंह का मानना है कि राज्य के भीतर ही आलू बीज का उत्पादन होने से बंगाल के किसानों की लागत में भारी कमी आएगी और उन्हें सीधा आर्थिक लाभ होगा।
हिमाचल प्रदेश की लाहौल-स्पीति घाटी (समुद्र तल से लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई) अपनी अत्यधिक ठंड के कारण प्राकृतिक रूप से वायरस-मुक्त क्षेत्र है। CPRI और स्थानीय सहकारी समितियों के प्रयासों से वहां एयरोपोनिक्स (बिना मिट्टी के, पोषक तत्वों वाली हवा में बीज उत्पादन) और टिश्यू कल्चर जैसी आधुनिक तकनीकों के जरिए रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से मुक्त, ''क्लाइमेट-रेजिलीनट'' (जलवायु-सहनशील) बीज तैयार किए जा रहे हैं।
समतल के अन्य जिलों की तुलना में उत्तर बंगाल के जिलों में ठंड का असर अधिक समय तक रहता है, जो लाहौल जैसी तकनीक और बीजों के अनुकूलन के लिए बेहद मुफीद है। इन बीजों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने से खेतों में कीटनाशकों का इस्तेमाल घटेगा, जिससे उत्पादन लागत कम होगी। 2021 के बाद से निजी निर्यात बंद होने से बंगाल में पंजाब के बीजों का दबदबा काफी बढ़ गया था। हालांकि, अब इस नए समझौते और सरकारी पहल के तहत उत्तर बंगाल के किसानों को ''कुफरी हिमालिनी'' और ''ज्योति'' जैसी उन्नत आलू किस्मों के बीज किफायती दरों पर मिल सकेंगे।
CPRI के सोशल साइंस विभाग के प्रमुख आलोक कुमार के अनुसार, भले ही बंगाल में जोतों (जमीन) का आकार छोटा होने के कारण कुछ तकनीकी सीमाएं हों, लेकिन उन्नत और सस्ते बीजों की उपलब्धता और स्थानीय स्तर पर बीज उत्पादन की यह ट्रेनिंग उत्तर बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देगी।