

रांची: झारखंड में नदियों के संरक्षण और प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से वन विभाग ने राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। इस पहल के तहत राज्य की प्रमुख नदियों के उद्गम स्थलों और संगम क्षेत्रों की पहचान कर उनका विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाएगा। अभियान का उद्देश्य जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त करना, अतिक्रमण हटाना और जल संरक्षण को बढ़ावा देना है।
राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) Sanjeev Kumar ने सभी वन प्रमंडल पदाधिकारियों (DFO) को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थित नदियों के उद्गम स्थलों की स्थिति का आकलन करने का निर्देश दिया है।
अधिकारियों को यह भी कहा गया है कि वे इन क्षेत्रों में मौजूद अतिक्रमण, प्रदूषण के स्रोत और पर्यावरणीय चुनौतियों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें। सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर संरक्षण और पुनर्स्थापन की कार्ययोजना बनाई जाएगी।
वन विभाग के अनुसार, सर्वेक्षण पूरा होने के बाद उद्गम स्थलों और आसपास के क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही जमा कचरे, प्लास्टिक और अन्य प्रदूषक तत्वों की सफाई कर जलधाराओं को स्वच्छ और अविरल बनाने का प्रयास किया जाएगा।
अधिकारियों का मानना है कि इससे नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने और जल स्रोतों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
वन विभाग इस अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखना चाहता। इसके लिए स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और युवाओं को भी जोड़ने की योजना बनाई गई है
क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक (RCCF) Smita Pankaj के अनुसार, नदियों के उद्गम स्थलों का संरक्षण होने से भूजल स्तर में सुधार होगा और जल उपलब्धता बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि यह पहल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
वन विभाग का मानना है कि Swarnarekha River और Kharkai River के संगम क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कर हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षेत्र भविष्य में जमशेदपुर के लिए रिवर फ्रंट इको-जोन के रूप में विकसित हो सकता है, जिससे शहर में तापमान नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
जमशेदपुर के डीएफओ Saba Alam Ansari का कहना है कि नदी किनारे अतिक्रमण होने से जलधारा का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता है।
उन्होंने बताया कि बरसात के दौरान नदी के फैलाव के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती, जिससे बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ जाता है। अतिक्रमण हटने के बाद नदी अपने प्राकृतिक मार्ग में बह सकेगी और जल प्रवाह अधिक संतुलित रहेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, नदी तटों पर खुले क्षेत्र रहने से वर्षा जल का अधिक मात्रा में भूजल में रिसाव होता है, जिससे भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) बढ़ता है।
इसके अलावा नदी तटीय क्षेत्र अनेक पक्षियों, जलीय जीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास होते हैं। अतिक्रमण हटने से इन जीव-जंतुओं को सुरक्षित वातावरण मिलेगा और जैव विविधता का संरक्षण संभव हो सकेगा।
वन विभाग दोमुहानी और अन्य नदी तटीय क्षेत्रों को वॉक-वे, पार्क और इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर भी विचार कर रहा है।
ऐसी परियोजनाओं से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और पर्यटन गतिविधियों को भी नया आयाम मिलेगा।
झारखंड में स्वर्णरेखा नदी नगड़ी, दामोदर नदी कामरपाट पहाड़ी बराकर नदी पदमा क्षेत्र, दक्षिण कोयल नदी नगड़ी, उत्तर कोयल नदी चैनपुर, शंख नदी रायडीह और खरकई नदी का उद्मम स्थल सिमलीपाल हिल्स है।