

अंजलि भाटिया
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि भारत के सामाजिक और राष्ट्रीय विकास की धुरी महिलाएं हैं। शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाएं किसी भी राष्ट्र की प्रगति की सबसे बड़ी ताकत होती हैं। उन्होंने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमा में बंधा भूभाग नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है—राष्ट्र पुरुष और राष्ट्र माता का रूप।
राष्ट्रपति मुर्मु ने ये विचार शनिवार को विज्ञान भवन में आयोजित महिला विचारकों के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन “भारती–नारी से नारायणी” के समापन सत्र को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सात और आठ मार्च को आयोजित इस सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षा, समाज, प्रशासन और बौद्धिक जगत से जुड़ी महिला विचारकों ने भाग लिया।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को केवल परिवार की संरक्षक के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति और समृद्धि की प्रतीक के रूप में देखा गया है। उन्होंने कहा कि आज की भारतीय महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल, उद्यमिता और सामाजिक सेवा सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और सुरक्षा मिले। महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार और शिक्षा व रोजगार के समान अवसर मिलना बेहद जरूरी है।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज भारत में महिला-नेतृत्व वाले विकास की अवधारणा तेजी से आगे बढ़ रही है। उन्होंने युवतियों को संदेश देते हुए कहा कि वे अपने सपनों को साकार करने के लिए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
उन्होंने कहा कि जब महिलाएं सशक्त होती हैं तो उसका प्रभाव केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और राष्ट्र भी मजबूत बनता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत की महिलाएं अपने ज्ञान, नेतृत्व और संवेदनशीलता के बल पर देश को प्रगति और समृद्धि की नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगी।
समापन समारोह में राष्ट्र सेविका समिति की मुख्य संचालिका वी. शांता कुमारी ने कहा कि महिलाओं को समाज से मिलने वाले प्रोत्साहन को स्वीकार करते हुए अपनी क्षमता का विस्तार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब क्षमता बढ़ती है तो सम्मान स्वयं प्राप्त होता है। समाज से मिलने वाले प्रोत्साहन का उपयोग समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नारी से नारायणी बनने की यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा बनने की प्रक्रिया है। भारतीय महिलाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर काम करना चाहिए और उस पर गर्व भी करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान और अनुभव का उपयोग करते हुए महिलाएं अपने आसपास सकारात्मक वातावरण बना सकती हैं और परिवार को सशक्त बनाकर पूरे समाज तथा राष्ट्र को मजबूत कर सकती हैं।
इस अवसर पर भारतीय विद्वत परिषद की सचिव शिवानी वी. ने सम्मेलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “भारती–नारी से नारायणी” सम्मेलन का लक्ष्य महिलाओं की मौन शक्ति से निर्णायक शक्ति तक की यात्रा को मजबूत करना है। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में देशभर से लगभग 1500 महिला विचारकों ने भाग लिया और महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, नेतृत्व, आत्मनिर्भरता तथा समाज में महिलाओं की भूमिका जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया।
सम्मेलन का आयोजन भारतीय विद्वत परिषद, राष्ट्र सेविका समिति और शरण्या संगठन ने संयुक्त रूप से किया। आयोजकों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य देश की महिलाओं को एक साझा मंच पर लाना, उनके अनुभवों और विचारों को साझा करना और महिला-नेतृत्व वाले राष्ट्र निर्माण की दिशा में ठोस पहल को आगे बढ़ाना है।