विवेकानंद ने दुनिया को सनातन धर्म के उदात्त सार से परिचित कराया: हिमंत

विवेकानंद ने दुनिया को सनातन धर्म के उदात्त सार से परिचित कराया: हिमंत
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गुवाहाटी : असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने शुक्रवार को स्वामी विवेकानंद को याद करते हुए कहा कि 1893 में आज ही के दिन शिकागो में दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषण ने पश्चिमी दुनिया को ‘सनातन धर्म’ के उदात्त सार से परिचित कराया था। उन्होंने कहा कि विवेकानंद का शांति, साहस और सद्भाव का संदेश आज भी समाज का मार्गदर्शन करता है और लोगों को प्रेरित करता है। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया मंच पर एक पोस्ट में कहा कि 1893 में 11 सितंबर को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था। उनके भाषण की शुरुआत “अमेरिका के बहनों और भाइयों” संबोधन से हुई थी, जिसने वहां मौजूद लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। शर्मा ने कहा कि विवेकानंद के भावपूर्ण और प्रभावशाली संबोधन ने पश्चिमी दुनिया के सामने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और सनातन धर्म के व्यापक विचारों को प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने संदेश के माध्यम से सार्वभौमिक सहिष्णुता और एक-दूसरे को स्वीकार करने की भावना पर जोर दिया।

भारत की आध्यात्मिक भूमिका को दुनिया के सामने रखा

मुख्यमंत्री के अनुसार, स्वामी विवेकानंद ने भारत को केवल एक प्राचीन सभ्यता के रूप में पेश नहीं किया, बल्कि उसे पूरी मानवता के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में दुनिया के सामने रखा। उनके शिकागो भाषण ने भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक विचारों की ओर पश्चिमी समाज का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि विवेकानंद का संदेश धार्मिक सहिष्णुता, मानवता और विभिन्न विचारों के सम्मान पर आधारित था। उनका मानना था कि अलग-अलग मार्गों और परंपराओं के बावजूद मानवता का मूल उद्देश्य एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सद्भाव कायम करना है।

आज भी प्रासंगिक है विवेकानंद का संदेश

हिमंत ने कहा कि आज भारत आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद के विचार और उनका शांति, साहस एवं सद्भाव का संदेश समाज के लिए पहले की तरह प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि विवेकानंद के विचार युवाओं को आत्मविश्वास, राष्ट्रसेवा और मानव कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और मानवीय मूल्यों पर आधारित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

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