सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: 13 दिन बात न करना ‘क्रूरता’ नहीं, पति बरी

वैवाहिक जीवन में अस्थायी संवादहीनता को ‘क्रूरता’ नहीं मानने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, 13 दिन बात न करने के मामले में पति को 498A से मिली राहत
वैवाहिक संवादहीनता के मामले में दिया अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक जीवन में मतभेद और अस्थायी संवादहीनता को “क्रूरता” नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ दिनों तक पति-पत्नी के बीच बातचीत बंद होना, अपने आप में दंडनीय अपराध के दायरे में नहीं आता।

क्या था पूरा मामला

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने उस व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे निचली अदालत और मद्रास उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत तीन साल की सजा सुनाई थी। मामला उस समय का है जब पति ने अपनी पत्नी से लगभग 13 दिनों तक बात नहीं की थी, जिसके बाद पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में उतार-चढ़ाव, मतभेद और कभी-कभी संवाद का बंद हो जाना सामान्य बात है। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि क्या परिस्थितियां इतनी गंभीर थीं कि उन्होंने आत्महत्या के लिए मजबूर किया या मानसिक उत्पीड़न का स्तर उस हद तक पहुंचा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल संवाद न होना, जब तक उसके साथ ठोस सबूत न हों, “क्रूरता” की कानूनी परिभाषा में नहीं आता।

आरोप और निचली अदालत का फैसला

मामले में आरोप था कि विवाह के बाद पति और ससुराल पक्ष ने दहेज की मांग को लेकर महिला को प्रताड़ित किया। इसके अलावा, यह भी आरोप था कि पति ने पत्नी से फोन पर बात करने से इनकार किया और उसे मानसिक रूप से आहत किया, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली।

इन्हीं आरोपों के आधार पर निचली अदालत ने पति और अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट पति को आरोपों से किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में असफल रहा। अदालत ने यह भी पाया कि केवल 13 दिनों तक बातचीत न करना, बिना किसी मजबूत सबूत के, क्रूरता सिद्ध नहीं करता। इसी आधार पर अदालत ने पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

यह फैसला वैवाहिक विवादों और 498A जैसे मामलों की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि हर वैवाहिक तनाव को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता, और प्रत्येक मामले में ठोस सबूतों का होना जरूरी है।

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