

ईटानगर : अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सोमवार को कहा कि निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का फैसला किसी एक अधिकारी या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे आयोग का सामूहिक निर्णय था। खांडू की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब एसआईआर की प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर कांग्रेस और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच राजनीतिक विवाद तेज है। खांडू ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से बार-बार यह सवाल उठाया गया है कि क्या एसआईआर का फैसला एकतरफा था। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग के अपने रिकॉर्ड में इसका स्पष्ट संस्थागत जवाब मौजूद है।
24 जून 2025 का आदेश सर्वसम्मति से हुआ जारी
निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि 24 जून 2025 को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर कराने का आदेश आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी किया गया था। यह प्रक्रिया बिहार से शुरू हुई और इसके बाद पश्चिम बंगाल तथा 30 अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक इसका विस्तार किया गया। आयोग ने यह भी कहा कि बाद में 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 27 अक्टूबर 2025 तथा 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 14 मई 2026 को जारी किए गए एसआईआर कार्यक्रमों को भी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी मिली थी। आयोग के अनुसार, 27 मई 2026 को उच्चतम न्यायालय ने 24 जून 2025 के एसआईआर आदेश को बरकरार रखा था।
आयोग ने मतभेद और अंतिम फैसले में अंतर बताया
एसआईआर को लेकर हाल में निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी या निर्वाचन आयुक्त द्वारा विचार-विमर्श के दौरान अलग राय व्यक्त किया जाना अंतिम निर्णय को अलग या एकतरफा फैसला नहीं बनाता। आयोग ने कहा कि संस्थागत निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत पूरे आयोग की मंजूरी से लिए गए। 23 सितंबर को भी आयोग ने कहा था कि एसआईआर समेत उसके सभी निर्णय पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णय हैं। आयोग ने यह भी कहा कि संस्थागत विचार-विमर्श में अलग-अलग राय आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
राहुल गांधी के आरोपों के बीच बढ़ा विवाद
एसआईआर को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर चुके हैं। विपक्ष की ओर से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने एसआईआर के फैसलों को संस्थागत और सर्वसम्मत बताते हुए इन आरोपों को खारिज किया है। आयोग के हालिया बयान के मुताबिक, एसआईआर से जुड़े फैसले आयोग के सभी सदस्यों की मंजूरी से लिए गए थे।
एसआईआर में छूटे मतदाताओं के लिए नई व्यवस्था
एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान जिन मतदाताओं को नाम नहीं मिलने या दस्तावेजों से संबंधित विसंगतियों को लेकर नोटिस मिला है, उनके लिए आयोग ने प्रक्रिया में बदलाव भी किया है। 26 सितंबर के निर्णय के अनुसार, ऐसे मामलों में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) संबंधित मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज एकत्र कर उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। सामान्य स्थिति में ऐसे मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के कार्यालय में सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी। आयोग ने यह भी कहा कि बिहार और पश्चिम बंगाल समेत 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर पूरा हो चुका है। जिन लोगों का नाम पुनरीक्षण के दौरान छूट गया है, वे मतदाता सूची के निरंतर अद्यतन की प्रक्रिया के तहत संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के समक्ष नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस पूरे विवाद के बीच पेमा खांडू का बयान निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड और एसआईआर के निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस में सत्तारूढ़ पक्ष की स्थिति को रेखांकित करता है, जबकि विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और आयोग के कामकाज पर सवाल उठा रहा है।