क्या‍ ‘कवच’ रोक सकता था ओडिशा का हादसा?

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कोई भी ट्रेन कोलिसन अवोयडेंस सिस्टम नहीं आता काम : रेलवे
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : ओडिशा के बालासोर में हुए ट्रेन हादसे की गिनती दुनिया की बड़ी रेल दुर्घटनाओं में की जा रही है। इस दर्दनाक हादसे में 275 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं। एक तरफ जहां देश में इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूत बुनियाद के माध्यम से दुनिया भर के बड़े इन्वेस्टर्स को आकर्षित करने का काम किया जा रहा है। वहीं देश में इस तरह के बड़े हादसे कई सवाल खड़े कर रहे हैं। इस बड़ी दुर्घटना को रोका जा सकता था। बीते साल ही भारत में कवच सिस्टम की टेस्टिंग की गई थी, जो कि ट्रेनों को हादसे का शिकार होने से बचाती है। ऐसे में इस तरह की तकनीक के होने के बाद भी बड़े रेल हादसे का होना विचारणीय विषय है।

इसी कड़ी में आइए जानते हैं क्या है कवच तकनीक और कैसे यह काम करती है?
क्या है कवच प्रोटेक्शन सिस्टम : यह एक खास तरह का ऑटोमेटिक प्रोटेक्शन सिस्टम है। कवच प्रोटेक्शन तकनीक को रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन की मदद से बनाया गया है। गौरतलब बात है कि इस तकनीक पर भारतीय रेलवे ने साल 2012 में ही काम करना शुरू कर दिया था। उस दौरान इस तकनीक का नाम ट्रेन कोलिसन अवोयडेंस सिस्टम (टीसीएएस) था। इस तकनीक का पहला ट्रायल साल 2016 में किया गया था।
कैसे काम करती है कवच तकनीक : कवच सिस्टम में हाई फ्रीक्वेंसी के रेडियो कम्युनिकेशन का इस्तेमाल किया जाता है। कवच प्रणाली तीन स्थितियों में काम करती है – हेड ऑन टकराव, रियर एंड टकराव, सिग्नल खतरा। कवच प्रणाली को हर स्टेशन और एक किलोमीटर की दूरी पर इंस्टॉल किया जाता है। इसके अलावा कवच तकनीक को ट्रैक और रेलवे सिस्टम में भी लगाया जाता है। ये सभी सिस्टम एक दूसरे के साथ अल्ट्रा हाई रेडियो फ्रीक्वेंसी पर कम्यूनिकेट करते हैं। अगर ट्रेन चलाते समय लोको पायलट किसी सिग्नल को जंप या कोई गलती करता है। ऐसे में कवच प्रणाली तुरंत एक्टिवेट हो जाती है और ट्रेन के ब्रेक कंट्रोल कर लेती है। इसके अलावा अगर एक ही पटरी पर दूसरी ट्रेन भी आ रही है, तो वह दूसरी ट्रेन को अलर्ट भेजकर कुछ दूरी पहले उसे रोक देती है।
कवच भी नहीं रोक सकता था हादसा : रेलवे बोर्ड की ओर से जया वर्मा सिन्हा ने साफ कहा कि यह ओवर स्पीड का मामला नहीं है। हालांकि सिग्नल में खराबी से इनकार नहीं किया गया है। बोर्ड के अनुसार, कवच भी इस दुर्घटना को नहीं रोक सकता था। जिस तरह से हादसा हुआ उसको रोकने करने का उपाय पूरी दुनिया में नहीं है। रेलवे बोर्ड की सदस्य जया वर्मा सिन्हा ने बताया कि कोरोमंडल एक्सप्रेस को ग्रीन सिग्नल मिला हुआ था। उसमें कोई परेशानी नहीं थी। 4 लाईन का स्टेशन है, 2 मेन लाईन और 2 लूप लाईन। उन्होंने कहा कि ऊपर वाली और नीचे वाली लूप लाइन पर माल गाड़ियां खड़ी थीं। रूट और सिग्नल सब ठीक थे। कोरोमंडल को ग्रीम सिग्नल मिला हुआ था और वह हादसे के वक्त कोरोमंडल 128 की स्पीड से जा रही थी जबकि यशवंतपुर एक्सप्रेस की स्पीड भी 126 किलोमीटर प्रति घंटा थी। केवल कोरोमंडल ट्रेन के साथ हादसा हुआ। वह पहले मालगाड़ी जिस मालगाड़ी से टकराई उसमें लोहा लदा हुआ था। इस वजह से मालगाड़ी अपनी जगह से हिली तक नहीं। वहीं कोरोमंडल के डिब्बे दूसरी पटरी पर जा गिरे। यहां यशवंतपुर ट्रेन के आखिरी दो डिब्बों से उसकी टक्कर हो गई।

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