

सर्जना शर्मा
भारत में रेलवे नेटवर्क का लगातार विस्तार हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी तेजी से सिमट रहे हैं। इसका सबसे गंभीर असर एशियाई हाथियों पर दिखाई देता है, जो अपने पारंपरिक मार्गों पर चलते हुए अक्सर रेलवे पटरियों से टकरा जाते हैं। इन हादसों को रोकने और हाथियों की मृत्यु दर कम करने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलिफेंट प्रभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान में 10 और 11 मार्च 2026 को “रेलवे पटरियों पर हाथियों की मृत्यु दर को कम करने के लिए नीति कार्यान्वयन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें प्रोजेक्ट एलिफेंट प्रभाग, रेल मंत्रालय, हाथी-बहुल राज्यों के वन विभागों तथा संरक्षण वैज्ञानिकों सहित लगभग 40 विशेषज्ञों ने भाग लिया।
भारत में हाथियों का महत्व और बढ़ती चुनौती
भारत में दुनिया की एशियाई हाथी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है। ये हाथी मुख्य रूप से पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी और मध्य भारत के जंगलों में रहते हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जंगलों के विखंडन, तेजी से बढ़ते रेलवे नेटवर्क और मानव गतिविधियों के विस्तार के कारण हाथियों के पारंपरिक मार्ग बाधित हो रहे हैं। परिणामस्वरूप असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में रेलवे पटरियों पर हाथियों की मौत के मामले बढ़े हैं।
यही कारण है कि अब संरक्षण और अवसंरचना विकास के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
संवेदनशील रेलवे खंडों की पहचान
पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन्यजीव संस्थान और रेल मंत्रालय ने संयुक्त रूप से देशभर में विस्तृत सर्वेक्षण कर हाथियों के आवास क्षेत्रों से गुजरने वाले रेलवे मार्गों का अध्ययन किया।
इस अध्ययन में कुल 127 रेलवे खंड, जो लगभग 3,452 किलोमीटर लंबे हैं, का विस्तृत मूल्यांकन किया गया। इनमें से 14 राज्यों में फैले 1,965.2 किलोमीटर के 77 रेलवे खंडों को सबसे अधिक संवेदनशील मानते हुए प्राथमिकता सूची में रखा गया है।
इन क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही के पैटर्न, दुर्घटनाओं के जोखिम और पारिस्थितिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष शमन उपायों की योजना बनाई गई है।
नई रेल परियोजनाओं में वन्यजीव-अनुकूल ढांचा
अब नई रेलवे परियोजनाओं में भी वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में गेवरारोड–पेंड्रारोड रेलवे लाइन, जो अचानकमार–अमरकंटक हाथी कॉरिडोर से गुजरती है, में विशेष संरचनात्मक उपाय शामिल किए गए हैं।
महाराष्ट्र में दरेकाशा–सालेकासा रेलवे ट्रैक तिहरीकरण परियोजना और नागभीड–इटवारी गेज परिवर्तन परियोजना में भी वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था की जा रही है।
इसके अलावा वडसा–गडचिरोली रेलवे लाइन, जो कन्हा–नवेगांव–ताडोबा–इंद्रावती बाघ कॉरिडोर को काटती है, वहां भी वन्यजीव-अनुकूल ढांचे पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
असम में बनेगा एलिवेटेड रेलवे खंड
असम में अज़ारा–कामाख्या रेलवे लाइन के 3.5 किलोमीटर लंबे एक संवेदनशील हिस्से को ऊंचा उठाकर बनाने की योजना है। यह हिस्सा रानी–गर्भंगा–दीपोर बील हाथी कॉरिडोर से गुजरता है, जहां पहले कई हाथियों की मौत हो चुकी है।
रेलवे लाइन को ऊंचा करने से हाथियों को नीचे से सुरक्षित पार होने का रास्ता मिल सके
एक महत्वपूर्ण तकनीक वितरित ध्वनिक प्रणाली आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली है, जिसे संवेदनशील रेलवे खंडों में लगाया जा रहा है। उत्तर-पूर्व सीमांत रेलवे के चार हिस्सों में इसका पायलट प्रयोग सफल रहा है। यह प्रणाली असम में 64.03 किलोमीटर हाथी कॉरिडोर और 141 किलोमीटर रेलवे ब्लॉक सेक्शन को कवर करती है।
इसी तरह तमिलनाडु के मदुक्करई क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाई गई है। इसमें 12 टावरों पर लगाए गए थर्मल और मोशन सेंसर कैमरे रेलवे ट्रैक के 100 मीटर के भीतर हाथियों की गतिविधि का पता लगा लेते हैं और तुरंत वन तथा रेलवे अधिकारियों को सूचना भेज देते हैं। इससे ट्रेन की गति कम कर हाथियों को सुरक्षित पार कराया जा सकता है।
समन्वय और शोध पर जोर
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि रेलवे और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय के बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।प्रतिभागियों ने जोखिम आकलन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल बनाने की आवश्यकता बताई। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणाली, रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली जैसे क्षेत्रों में शोध को प्राथमिकता देने की भी सिफारिश की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि विज्ञान आधारित रणनीति, आधुनिक तकनीक और विभिन्न संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से ही हाथी–ट्रेन टक्करों को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है।