नारी से नारायणी: मौन शक्ति से निर्णायक शक्ति तक, महिला चिंतको का अखिल भारतीय सम्मेलन (Part II)

आज की नारी मौन शक्ति से आगे बढ़कर नीति-निर्माण,विज्ञान,साहित्य,कला औरआध्यात्मिकता में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रही है। नारी जब अपने भीतर स्थित आठ शक्तियों को पहचान लेती है
नारी से नारायणी: मौन शक्ति से निर्णायक शक्ति तक, महिला चिंतको का अखिल भारतीय सम्मेलन (Part II)
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सर्जना शर्मा

आज की नारी मौन शक्ति से आगे बढ़कर नीति-निर्माण,विज्ञान,साहित्य,कला औरआध्यात्मिकता में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रही है। नारी जब अपने भीतर स्थित  आठ शक्तियों को पहचान लेती है, तब वह केवल परिवार कीआधारशिला नहीं रहती—वह समाज और राष्ट्र की दिशा-निर्देशिका बन जाती है। यही है “नारी से नारायणी” की वास्तविक परिभाषा—एक ऐसी यात्रा, जिसमें स्त्री अपनीअंतर्निहित दिव्यता को जागृत कर विश्व को आलोकित करती है। जिसमें भारतीय परंपरा औरवैदिक काल की आठ शक्तियों को 21 वीं सदी के अनुसार परिभाषित किया गया है। जब हम “नारी से नारायणी” की संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्ट सिद्धि के साथ देखते हैं पाते हैं कि नारी ने  सदैव परिवारों को संभाला है, परंपराओं को सुरक्षित रखा है और समाज को स्थायित्व प्रदानकिया है।

किंतु आज महिला सशक्तिकरण की चर्चा केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है; महिलाएं समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रनिर्माण की सक्रिय निर्माता बन चुकी हैं। उनमें संतुलन, समन्वय और सकारात्मक परिवर्तन लाने की अद्वितीय क्षमतानिहित है। इसी व्यापक दृष्टि को साकार करने के उद्देश्य से “भारती” सम्मेलन महिलाओं को जोड़कर भारत को जोड़ने का प्रयास है।महिला शक्ति के आठ आयामसम्मेलन में महिला सशक्तिकरण को आठ प्रमुख स्तंभों के माध्यम से परिभाषित कियागया है  इनमें आठ क्षेत्रों की विशेषज्ञ हिस्सालेंगी ।

1. विद्या – ज्ञान ही शक्तिउच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, कौशल विकास, रोजगार और नेतृत्व के अवसरसुदृढ़ करना। क्योंकि शिक्षित नारी ही जागरूक समाज की आधारशिला है।

2. मुक्ति – आत्म जागरूकतासच्ची स्वतंत्रता आत्म-पहचान, मानसिक विकास और सामाजिकचेतना से प्राप्त होती है। गरीबी, हिंसा और असमानता से मुक्तिपाकर सम्मानपूर्ण जीवन ही वास्तविक आज़ादी है।

3. प्रकृति – संवेदनशीलव्यवस्थामासिक धर्म, मातृत्व, बाल-देखभाल और रजोनिवृत्ति जैसी अवस्थाओं में सहयोगीवातावरण का निर्माण। ऐसी कार्य-संरचना,जिससे महिलाएंपरिवार और कार्यस्थल दोनों का संतुलन सहजता से कर सकें।

4. सिद्धि – सफलता की कहानियाँउन महिलाओं का सम्मान, जिन्होंने अपनी मेहनत औरधैर्य से परिवार और समाज को सशक्त बनाया। उनकी उपलब्धियां नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

5. शक्ति – आत्मनिर्भरताआर्थिक साक्षरता, कौशल प्रशिक्षण और ऋणसुविधाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना। नैतिक मूल्यों के साथ उन्नतिपर बल देना।

6. चेतना – कार्यस्थल परसमानताभेदभाव और असमानता को समाप्त कर ऐसा वातावरण बनाना, जहाँ योग्यता के आधार पर महिलाओं को निर्णय लेने और नेतृत्वकरने का अवसर मिले।

7. संस्कृति – मजबूत जड़ेंपरिवार और समाज के संस्कारों को सुदृढ़ करने में महिलाओं की महत्वपूर्णभूमिका। आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखना।

8. कृति – कार्य योजनाविचारों को ठोस योजनाओं में परिवर्तित करना। सम्मेलन को सकारात्मक परिवर्तन की स्थायी शुरुआत बनाना।

“भारती नारी सेनारायणी” तीन संस्थाएं मिल करआयोजित कर रही है भारतीय विद्वत परिषद यह एक ट्रस्टहै, जो भारतीय शास्त्रों केअध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करता है। यह 2,500 से अधिक विद्वानों, शोधकर्ताओं और शिक्षकों कासक्रिय मंच  है। जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। दूसरी है राष्ट्र सेविका समिति 1936 में नागपुर में लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा स्थापित यह संगठन महिलाओं को संगठित कर राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सुदृढ़ करता है। और तीसरा है शरण्या 2016 में स्थापित यह स्वयं सेवी संस्था है जो  विशेषकर दिल्ली की झुग्गी झोंपडी बस्तियों में काम कररहा है। शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिकजागरण के माध्यम से यह वंचित वर्ग की महिलाओं को सशक्त बना रही है। 

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