नारी से नारायणी: मौन शक्ति से शक्ति तक, महिला चिंतको का अखिल भारतीय सम्मेलन (Part I)

भारतीय सोच और परंपरा के आलोक में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर
नारी से नारायणी: मौन शक्ति से शक्ति तक, महिला चिंतको का अखिल भारतीय सम्मेलन (Part I)
Published on

सर्जना शर्मा   

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पश्चिमीदेशों से आयी एक अवधारणा है। नारी मुक्ति का जो आंदोलन पश्चिमी देशों में शुरू हुआउसने बहुत जोर पकड़ा और इसकी धमक भारत तक भी आयी। ये एक ऐसा आंदोलन था जो शुरू तोसमान मजदूरी और समानता के अधिकार की मांग को लेकर हुआ था लेकिन पता नहीं कैसे येपूरी तरह से पुरूष विरोधी बन गया।

पुरूषों से हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा उनकोअपना शोषक मानना पितृ सत्ता का विरोध, विवाह संस्था का विरोध त्योहारों रस्मोंरिवाजों का विरोध और यहां तक कि महिलाओं ने ब्रा बर्निंग , रोड बिलोंग्स टू अस  ,किस ( KISS ON THE ROAD)  ऑन दा रोड जैसे प्रदर्शन भी किए। एक समय तक तो खूबप्रसिद्धी मिली अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी ये महिलाओं को उनके अधिकार दिलानेमें काफी हद तक सफल रहा। लेकिन इसके कुछ साइड इफैक्ट्स भी हुए। पश्चिमी देशों मेंएक समय के बाद इसका जोश और रंग फीका पड़ने लगा। भारत जैसे परंपरागत समाज में भी नारीमुक्ति की पश्चिमी अवधारणा बहुत सफल नहीं हो पायी। भारतीय चिंतन परंपरा मेंनारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सृष्टि-चेतना की आधारशिला माना गया है। “नारी से नारायणी” की अवधारणा उसी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है, जहाँ स्त्री धैर्य, संयम, मौन,सहनशीलता से आगे बढ़कर रणनीतिक, सृजनात्मक और दिव्य शक्ति का स्वरूप धारण करती है।

यहपरिवर्तन केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मबोध और शक्ति-साक्षात्कार कीप्रक्रिया है।पश्चिमी नारी मुक्ति आंदोलन की सोच से बिल्कुल अलग है भारतीय महिला सशक्तिकरणकी अवधारणा पहली बात तो वैदिक काल से ही भारतीय महिला सशक्त है विदुषी है महिषी हैआचार्य है गुरु है। पश्चिमी देशों की महिलाओं ने संघर्ष करके जो अधिकार प्राप्तकिए वो उसे हजारों वर्ष पहले प्राप्त थे। भारतीय सोच नारी मुक्ति की  नहीं नारी सशक्तिकरण की है पुरुषों से प्रतिद्वंद्वितानहीं एक दूसरे के पूरक होने की है। भारतीय चिंतन में नारी और पुरुष एक दूसरे केपूरक हैं और नारी परिवार  की धुरी है समाजराष्ट्र के निर्माण में योगदान देती है इसी सोच के साथ दिल्ली के विज्ञान भवन में7 और 8 मार्च को देश भर की महिला चिंतकों का अखिल भारतीय सम्मेलन होगा। जिसका नामदिया गया है – भारती – नारी से नारायणी --- इस संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्ट सिद्धि के साथ देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है किस्त्री-सशक्तिकरण कोई आधुनिक आंदोलन मात्र नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिकचेतना की शाश्वत धारा है।

आज की नारी मौन शक्ति से आगे बढ़कर नीति-निर्माण,विज्ञान,साहित्य,कला औरआध्यात्मिकता में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रही है। नारी जब अपने भीतर स्थित  आठ शक्तियों को पहचान लेती है, तब वह केवल परिवार कीआधारशिला नहीं रहती—वह समाज और राष्ट्र की दिशा-निर्देशिका बन जाती है। यही है “नारी से नारायणी” की वास्तविक परिभाषा—एक ऐसी यात्रा, जिसमें स्त्री अपनीअंतर्निहित दिव्यता को जागृत कर विश्व को आलोकित करती है। जिसमें भारतीय परंपरा औरवैदिक काल की आठ शक्तियों को 21 वीं सदी के अनुसार परिभाषित किया गया है। जब हम “नारी से नारायणी” की संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्ट सिद्धि के साथ देखते हैं पाते हैं कि नारी ने  सदैव परिवारों को संभाला है, परंपराओं को सुरक्षित रखा है और समाज को स्थायित्व प्रदानकिया है।

किंतु आज महिला सशक्तिकरण की चर्चा केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है; महिलाएं समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रनिर्माण की सक्रिय निर्माता बन चुकी हैं। उनमें संतुलन, समन्वय और सकारात्मक परिवर्तन लाने की अद्वितीय क्षमतानिहित है। इसी व्यापक दृष्टि को साकार करने के उद्देश्य से “भारती” सम्मेलन महिलाओं को जोड़कर भारत को जोड़ने का प्रयास है।महिला शक्ति के आठ आयामसम्मेलन में महिला सशक्तिकरण को आठ प्रमुख स्तंभों के माध्यम से परिभाषित कियागया है  इनमें आठ क्षेत्रों की विशेषज्ञ हिस्सालेंगी ।

संबंधित समाचार

No stories found.

कोलकाता सिटी

No stories found.

खेल

No stories found.
logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in