

आइजोल : मिजोरम की तीन स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) — मारा, लाई और चकमा — पर कुल 159.59 करोड़ रुपये की वेतन कमी का दबाव है। बढ़ते वेतन खर्च और सीमित गैर-वेतन मद के कारण परिषदों के सामने गंभीर वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। तीनों ADC के मुख्य कार्यकारी सदस्यों (CEM) ने राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर अतिरिक्त धनराशि जारी करने की मांग की है। मारा ADC के CEM एम. लाइकाव के मुताबिक, मारा स्वायत्त जिला परिषद में वेतन की कमी 25.88 करोड़ रुपये, लाई ADC में 69.93 करोड़ रुपये और चकमा ADC में 63.78 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि परिषदों के बजट का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब कर्मचारियों के वेतन पर खर्च हो रहा है, जिससे विकास योजनाओं और अन्य जरूरी गतिविधियों के लिए बेहद सीमित राशि बचती है।
वेतन खर्च बढ़ा पर गैर-वेतन फंड सीमित
तीनों परिषदों के नेताओं ने बढ़ते वित्तीय दबाव के लिए वेतन में समय-समय पर किए गए संशोधन, महंगाई भत्ता (DA), वार्षिक वेतन वृद्धि, कर्मचारियों की पदोन्नति और कर्मचारियों को नियमित किए जाने को प्रमुख कारण बताया। उनके मुताबिक इन बदलावों के कारण वेतन संबंधी खर्च लगातार बढ़ता गया, जबकि वेतन से इतर खर्चों के लिए मिलने वाली राशि में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। ADC नेताओं ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 तक राज्य सरकार वेतन और गैर-वेतन मद के लिए अलग-अलग फंड उपलब्ध कराती थी। हालांकि, 2024-25 से धनराशि 'ग्रांट-इन-एड (जनरल)' शीर्षक के तहत दी जा रही है। परिषदों का कहना है कि इससे वेतन संबंधी अतिरिक्त जरूरतों को पूरा करना और मुश्किल हो गया है।
संशोधित अनुमान से अतिरिक्त फंड की मांग
लाइकाव ने कहा कि पहले राज्य वित्त आयोग के कार्यकाल के दौरान वेतन की अतिरिक्त जरूरतों को आम तौर पर रिवाइज्ड एस्टीमेट (RE) के जरिए पूरा किया जाता था। हालांकि, 2021-22 से 2025-26 तक काम करने वाले दूसरे वित्त आयोग के दौरान 2022-23 को छोड़कर अतिरिक्त फंड उपलब्ध नहीं कराया गया। ADC नेताओं के मुताबिक वित्तीय संकट का असर केवल परिषदों के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। परिषद क्षेत्रों में चर्चों और आम लोगों से जुड़ी गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि नियमित प्रशासनिक और विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं होने से स्थानीय स्तर पर कई जरूरी गतिविधियां बाधित हो रही हैं।
16 फीसदी आबादी को केवल 4 फीसदी फंड मिलने का दावा
लाइकाव ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि मिजोरम की कुल आबादी का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा इन तीन ADC क्षेत्रों में रहता है, लेकिन राज्य के कुल फंड में इन परिषदों को केवल करीब 4 प्रतिशत हिस्सा मिलता है। परिषद नेताओं ने इस वित्तीय असमानता को दूर करने की भी मांग की है।
20 विभागों के हस्तांतरण पर भी सवाल
तीनों ADC नेताओं ने परिषदों को सौंपे गए संवैधानिक अधिकारों और विभागों के पूर्ण हस्तांतरण को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, 1993 में तीनों परिषदों को 20 विभाग सौंपे गए थे, लेकिन इन विभागों से जुड़े विकास कार्यों और योजनाओं का पूर्ण नियंत्रण परिषदों को नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कृषि, पशुपालन, लोक निर्माण विभाग (PWD) और मत्स्य पालन जैसे विभाग औपचारिक रूप से ADC के अधिकार क्षेत्र में होने के बावजूद राज्य सरकार अभी भी परिषद क्षेत्रों में इन विभागों से जुड़े काम और विकास योजनाएं संचालित कर रही है। परिषद नेताओं ने राज्य सरकार द्वारा गठित गुप्ता आयोग की 2011 की सिफारिश का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, आयोग ने सुझाव दिया था कि ADC को सौंपे गए विभागों के साथ उनसे संबंधित विकास कार्य और योजनाएं भी पूरी तरह परिषदों को हस्तांतरित की जानी चाहिए। हालांकि, उनका दावा है कि इस सिफारिश को अब तक लागू नहीं किया गया है।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील
लाइकाव ने बताया कि तीनों ADC के नेताओं ने राज्यपाल विजय कुमार सिंह और मुख्यमंत्री लालदुहोमा को ज्ञापन सौंपकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने परिषदों की लंबित वेतन देनदारियों को पूरा करने के लिए रिवाइज्ड एस्टीमेट के माध्यम से अतिरिक्त फंड जारी करने की मांग की। ADC नेताओं ने साथ ही परिषदों को सौंपे गए विभागों, विकास योजनाओं और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का वास्तविक हस्तांतरण सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि पर्याप्त वित्तीय संसाधन और संवैधानिक शक्तियां मिलने पर ही तीनों स्वायत्त जिला परिषदें अपने क्षेत्रों में विकास और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा सकेंगी।