गिरजाघर विवाद में धार्मिक न्यायाधिकरण नहीं बन सकता प्रशासन: हाईकोर्ट

गिरजाघर विवाद में धार्मिक न्यायाधिकरण नहीं बन सकता प्रशासन: हाईकोर्ट
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शिलांग : मेघालय हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी गिरजाघर के आंतरिक धार्मिक विवाद को सुलझाने के लिए जिला प्रशासन खुद को धार्मिक न्यायाधिकरण की भूमिका में नहीं रख सकता। अदालत ने मावखर प्रेस्बिटेरियन चर्च से जुड़े मामले में पूर्वी खासी हिल्स के उपायुक्त (डीसी) द्वारा जारी उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके जरिए गिरजाघर में पादरी संबंधी सेवाओं और धार्मिक संस्कारों पर रोक लगाई गई थी। न्यायमूर्ति एच. एस. थांगखीव ने कहा कि प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठा सकता है, लेकिन उसे अलग-अलग धार्मिक समूहों या धर्मसभाओं के बीच धार्मिक अधिकार क्षेत्र तय करने का अधिकार नहीं है।

धार्मिक अधिकार क्षेत्र तय करना डीसी के अधिकार से बाहर

अदालत ने मावखर प्रेस्बिटेरियन चर्च की रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि किसी विवाद के कारण कार्यपालिका को धार्मिक संप्रदाय के आंतरिक मामलों को नियंत्रित करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत के अनुसार, जिला प्रशासन किसी ऐसे व्यक्ति या समूह के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, जिसकी गतिविधि कानून का उल्लंघन करती हो या जिससे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वास्तविक और तत्काल खतरा पैदा हो। हालांकि, प्रशासन प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया के आंतरिक संविधान की व्याख्या करके यह तय नहीं कर सकता कि किस धर्मसभा को किसी चर्च पर धार्मिक अधिकार क्षेत्र हासिल है। न्यायमूर्ति थांगखीव ने स्पष्ट किया कि मावखर चर्च के विवाद में अदालत भी यह तय नहीं कर रही है कि कौन-सा पक्ष चर्च का धार्मिक रूप से संचालन करने का हकदार है। ये मामले संबंधित धार्मिक संगठन की आंतरिक व्यवस्था और विवाद निपटान प्रक्रिया के तहत तय किए जाने हैं।  

13 मई का कारण बताओ नोटिस भी रद्द

हाईकोर्ट ने उपायुक्त की ओर से 13 मई को जारी कारण बताओ नोटिस तथा 19 जून को जारी दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। इन आदेशों में केजेपी सिनॉड मिहंगी को मावखर प्रेस्बिटेरियन चर्च में पादरी संबंधी सेवाएं देने और धार्मिक संस्कार संपन्न कराने से रोक दिया गया था। अदालत ने 8 मई के प्रशासनिक पत्र और 12 मार्च की बैठक के निर्देशों में भी उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसके तहत चर्च के आंतरिक प्रशासन और गतिविधियों पर व्यापक या अनिश्चित अवधि की रोक लगाई गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसी रोक के लिए सार्वजनिक व्यवस्था के लिए किसी विशिष्ट और प्रमाणित खतरे का आधार होना जरूरी है। 

2019 की वित्तीय अनियमितता से शुरू हुआ विवाद

मामले की पृष्ठभूमि 2019 के एक वित्तीय विवाद से जुड़ी है। फैसले के अनुसार, उस समय करीब 2.86 करोड़ रुपये की राशि का हिसाब नहीं मिलने की बात सामने आई थी। बाद में किए गए ऑडिट में करीब 4.65 करोड़ रुपये के कथित गबन की पुष्टि होने की बात कही गई। इसके बाद 3 अगस्त 2019 को करीब 3.26 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। वित्तीय विवाद के बाद चर्च के पादरी रेवरेंड एम. पिंगरोप के निलंबन और उन्हें पद से हटाने को लेकर भी विवाद हुआ। इसके अलावा चर्च की संबद्धता खासी जैंतिया प्रेस्बिटेरियन धर्मसभा सेपंगी के साथ बनाए रखने या उससे अलग होने को लेकर मतभेद बढ़ता गया। 

फरवरी 2026 में अलग होने का प्रस्ताव

विवाद के बीच मावखर प्रेस्बिटेरियन चर्च की सभा ने 1 फरवरी 2026 को केजेपी सिनॉड सेपंगी से अलग होने का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद चर्च के प्रशासन और धार्मिक सेवाओं को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। मुख्य विवाद यह था कि क्या केजेपी सिनॉड मिहंगी के पादरी मावखर चर्च में धार्मिक सेवाएं और संस्कार करा सकते हैं। इसी विवाद के दौरान जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और संबंधित धार्मिक सेवाओं पर रोक के निर्देश जारी किए।

सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति बरकरार

हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि किसी धार्मिक विवाद के कारण शांति भंग होने की वास्तविक आशंका हो तो प्रशासन एहतियाती कदम उठा सकता है। हालांकि, ऐसे कदमों का उद्देश्य केवल सार्वजनिक शांति बनाए रखना होना चाहिए, न कि किसी धार्मिक संस्था के आंतरिक अधिकार क्षेत्र या धार्मिक अधिकारों का अंतिम निर्धारण करना। अदालत ने मावखर चर्च से जुड़े प्रमुख धार्मिक और प्रशासनिक प्रश्नों पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। इनमें 1 फरवरी के अलगाव प्रस्ताव की वैधता, पादरी या पदाधिकारियों की नियुक्ति अथवा हटाने की वैधता तथा केजेपी सिनॉड सेपंगी और मिहंगी के धार्मिक अधिकार क्षेत्र जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन प्रश्नों को संबंधित सक्षम धार्मिक, दीवानी या वैधानिक मंचों के लिए खुला रखा गया है। अदालत ने दोनों पक्षों से शांति और व्यवस्था बनाए रखने तथा कानून अपने हाथ में नहीं लेने को कहा। किसी पक्ष की ऐसी गतिविधि जो अपराध या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करे, उसके खिलाफ सक्षम प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।

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